29 मई 1453 को क़ुस्तुंतुनिया का फ़तह होना क्युं ऐतिहासिक घटना है ?

 


क़ुस्तुंतुनिया – कांस्टैंटिनोपुल – इस्तानबुल तुर्की का तारीख़ी शहर है। यह बासफोरस और मारमरा के दहाने पर मौजूद है। यह एक तारीख़ी शहर है जो रोमन, बाइजेंटाइन, लैतिन, एवं उस्मानी साम्राज्य की राजधानी थी। इसको लेकर इसाइयों एवं मुसलमानों में भयंकर संघर्ष हुआ।

कुस्तुन्तुनिया की स्थापना रोमन सम्राट् कांस्टैंटाइन ने 328 ई. में प्राचीन नगर बाईज़ैंटियम को विस्तृत रूप देकर की थी। रोमन साम्राज्य की राजधानी के रूप में इसका आरंभ 11 मई 330 ई. को हुआ था। कहते हैं कि जब यूनानी साम्राज्य का विस्तार हो रहा था तो प्राचीन यूनान के नायक बाइज़ैस ने मेगारा नगर को बाइज़ैन्टियम के रूप में स्थापित किया था. यह बात 667 ईसापूर्व की है. उसके बाद जब कॉंस्टैन्टीन राजा आए तो इसका नाम कॉंस्टैंटिनोपल रख दिया गया जिसे हम कुस्तुन्तुनिया के रूप में पढ़ते आए हैं. यही आज का इस्ताम्बुल शहर है.

क़ुस्तुन्तुनिया कभी हार का मुंह ना देखने वाला शहर माना जाता था जो आज भी मूल्यवान कलात्मक‚ साहित्यिक और ऐतिहासिक धरोहरों से मालामाल समझा जाता है, 12 मीटर उंची दिवारों से घिरे इस शहर को भेदना उस समय किसी के लिए मुमकिन नही था।

इस शहर को फ़तह करने की कोशिश 559 ई. मे ही शुरु हो गई थी, सबसे पहले नाकाम कोशिश Kutrigurs ने की, फिर 626 मे Sasanian Empire ने भी हमला किया और नाकाम हुए .. फिर आया इस्लाम का दौर, दौर ए उमय्यद मे 674 से 718 के बीच दो बार कुस्तुन्तुनिया का मुहासिरा किया गया जिसमे हज़रत अबु अस्युब अंसारी (र) ख़ुद शरीक हुए, नाकामयाबी हाथ लगी.. 813 मे बुलगारिया के क्रुम मे हमला किया और नाकामयाब हुए .. इसके बाद 860 से 941 के बीच रुस ने इस शहर पर तीन बड़े हमले किए पर नाकामयाब हुए .. फिर 1203 और 1204 मे धोखे से क्रुसेडर ने इस शहर पर हमला कर लिया और ख़ुब लुट पाट किया और इसे Empire of Romania यानी लातिनी के हवाले कर दिया जिसे #SackofConstantinople के नाम से जाना गया पर 25 जुलाई 1261 मे इसे Empire of Nicaea द्वारा वापस हासिल कर लिया गया जो Byzantine Empire का ही हिस्सा था .. इस के लिए 1235 मे बुलगारियन और निकाया ने मिल कर एक नाकामयाब हमला किया था .. फिर 1248 से 1261 के बीच मे Nicaea ने एक एक कर तीन बार नाकामयाब हमला किया .. और आख़िर 25 जुलाई 1261 को बिना लड़े ही जीत हासिल कर लिया क्योंके इन्हे रोकने वाला कोई था ही नही.. इसके बाद इस शहर की ज़बर्दस्त क़िलेबंदी हुई.. फिर उस्मानीयों का दौर आया जो बड़ी तेज़ी से युरोप मे घुसे जा रहे थे पर उनके रास्ते के बीच कुस्तुन्तुनिया पड़ रहा था जिसे जीतना बहुत ज़रुरी था. सुलतान बायज़ीद I के दौर मे 1390 से 1402 के इस शहर का मुहासरा हुआ पर तैमुर की वजह कर नाकामयाबी हाथ लगी, फिर 1411 मे हमला किया गया और एक बार फिर नाकामयाबी हाथ लगी , 1422 सुलतान मुराद II ने एक बार फिर मुहासरा किया, फिर नाकामयाबी हाथ लगी, वापस लौटना पड़ा … फिर उनका बेटा सुलतान मुहम्मद II गद्दी पर बैठा और सिर्फ़ 21 साल की उमर मे उसने इस शहर को 53 दिन के मुहासरे के बाद 29 मई 1453 को फ़तह कर लिया जिसे अपने वक़्त की अज़ीम फ़ौज पिछले 1500 साल से फ़तह ना कर सकी थी और इस पुरे वाक़ियो को हम #FallofConstantinople के नाम से जानते हैं..

असल मे सुल्तान मुहम्मद II और उनके इस फ़तह की पेशनगोइ पैगम्बर अलैहि सलाम ने अपनी एक हदीस (मसनद अहमद ) में काफी पहले कर दी थी :- “निश्चित ही तुम कुस्तुनतुनिया फतह करोगे वो एक बहुत अज़ीम सिपह सालार होगा और उसकी बहुत अज़ीम सेना होगी”

ये फ़तह 53 दिन की उतार चढ़ाओ कि जंग के बाद नसीब होती है.. इसके बाद जो हुआ वो तारीख़ है 1500 साल से चली आ रही बाइजेण्टाइन साम्राज्य हमेशा के लिए ख़त्म हो जाती है.

⏩ 6 अप्रैल 1453 ई. को शुरु हुई जंग मे बाइजे़ण्टाइन लगातार भारी पड़ रहे थे, चुंके एक जगह खड़े हो कर उन्हे उस्मानीयों को रोकना था.. 22 अप्रैल 1453 एक ऐसा तारीख़ी दिन है जब दुनिया ने एक ऐसी जंगी हिकमत अमली देखी जिस पर वह आज भी हैरतज़दा हैं जब मुहासिरा कुस्तुन्तुनिया के दौरान “सुल्तान मुहम्मद फ़ातेह” ने समुंद्री जहाज़ों को ज़मीन पर चलवा दिया. बासफोरस से शहर कुस्तुन्तुनिया के अंदर जाने वाली पानी के रास्ते ‘शाख़ ज़रीं’ के दहाने पर बाइज़ेण्टाइनीयों ने एक ज़ंजीर लगा रखी थी जिस की वजह से उस्मानी समुंद्री जहाज़ शहर के करीब न जा सकते थे…. सुल्तान ने शहर के एक जानिब के इलाक़े से जहाज़ों को ज़मीन पर से गुज़ार कर दुसरी जानिब पानी में उतारने का अजीब ओ गरीब मंसूबा पेश किया और 22 अप्रैल 1453 ई. को उस्मानियों के अज़ीम जहाज़ खुश्की पर सफ़र करते हुए शाख़ जरीं में दाखिल हो गए, और इसके लिए उस्मानी फ़ौजों ने ज़मीन पर रास्ता बनाया और दरख्तों के बड़े तनों पर चर्बी मल कर जहाज़ों को उनपर चढ़ा दिया गया और हवा का रुख़ देखते हुएे जहाज़ों के बादबान भी खोल दिए गए और रात ही रात में उस्मानी बेड़े का एक बड़ा हिस्सा शाख़ जरीं में था..

सुबह कुस्तुन्तुनिया की दिवारों पर खड़े बाइजे़ण्टाइनी फौजी आँखें मलते रह गए के ये ख्वाब है या हक़ीक़त ? ज़ंजीर अपनी जगह क़ायम है और उस्मानी जहाज़ शहर के किनारे पर खड़े हैं…..

बहरहाल ये हिकमत अमली कुस्तुन्तुनिया की फ़तह में सबसे अहम रही क्यूँकि इसी की बदौलत उस्मानियों को पहली बार शहर के इतने क़रीब पहुंचने का मौक़ा मिला और 29 मई को उन्होंने कुस्तुन्तुनिया को फ़तेह कर लिया.

⏩ हर तरफ़ से 12 मीटर उंची दिवार से घिरे इस शहर मे दाख़िल होने के लिए अरबन ओस्ताद ने सुल्तान के हुक्म पर शाही तोप तोप बनाई जिसके मार की ताक़त बहुत अधिक थी.. इस तोप ने ही दिवारों मे छेद कर डाले जिससे उस्मानी फ़ौज शहर के अंदार दाख़िल हो सकी.

⏩ इस जंग मे एक बहुत मज़बुत और बहादुर सिपाही और भी था जिसे दुनिया बहुत कम जानती है , जो के सुल्तान महमद की परछाई था और इसी सिपाही को क़ुस्तुन्तुनिया के क़िले पर सबसे पहले उस्मानी झण्डा फहराने का शर्फ़ हासिल हुआ , इस सिपाही का नाम था “उलुबातली हसन” जो के क़ुस्तुन्तुनिया को फ़तह करने के बाद 25 साल की उमर मे शहीद हो गया था.

क़ुस्तुन्तुनिया को फ़तह करने के लिए 53 दिन (April 6, 1453 – May 29, 1453) तक चली जंग मे ये हमेशा मैदान मे डटे रहे और आख़िर मे वो दिन आया जब क़ुस्तुन्तुनिया फ़तह हुआ और क़ुस्तुन्तुनिया पर उस्मानी झण्डा फहरा और इसे को फहराने के वास्ते उलुबातली हसन तीर बरछे व भाले का परवाह किये बगै़र दीवार पर चढ़ गए और उस्मानी झण्डा फहरा कर शहीद हो गए ✊ उनके बदन से 27 तीर निकाली गई थीं जो उन्हे जंग के दौरान लगी.

फ़तह क़ुस्तुन्तुनिया के बाद ख़िलाफ़ते उस्मानीया की राजधानी एदिर्न (Edirne) से हटाकर क़ुस्तुन्तुनिया ला दी गयी और इस जगह को आज दुनिया इंस्तांबुल के नाम से जानती है।

यहां एक बात क़ाबिले गौर है कि… बाइज़ेण्टाइनी सल्तनत में रोमन कैथोलिक और ग्रीक ओर्थोडाक्स के बीच बहुत सालों से लड़ाई होती आ रही थी… रोमन कैथोलिक… ग्रीक ओर्थोडाक्स पर हावी रहते थे… जब सुल्तान मुहम्मद फातेह ने बाइज़ेण्टाइनी सल्तनत पर हमला किया तो ग्रीक ओर्थोडाक्स ने उस्मानीयों का साथ दिया था.. इसलिए सुल्तान ने ग्रीक चर्च को मज़हबी मामलात में आज़ादी दी…. बदले में चर्च ने उस्मानी सल्तनत को कुबूल कर लिया..! इनके अंदर 1204 के वाक़िये को लेकर भी आपस मे ना इत्तेफ़ाक़ी थी.. बहरहाल

सुलतान मोहम्मद फ़ातेह ने शहर पर फ़तह हासिल करने के बाद पहला आदेश जारी करके शहर के निवासियों को सुरक्षा और स्वतंत्रता प्रदान की, उन्होने वहां मौजुद तमाम इसाईयो को मज़हबी आज़ादी दी और यहां तक के सुलतान मुहम्मद ने इसाईयो की इज़्ज़त ओ आबरु, जान ओ माल की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ख़ुद ली।

इस तरह उन्दलुस(स्पेन) के ज़वाल के बाद पहली बार उस्मानी फ़ौज को यूरोप में घुसने का रास्ता मिलता है और बालकन (सर्बिया , बोसनिया , अलबानिया) के इलाके़ ‘क्रीमिया’ व इटली के ओरंटो पर उस्मानियों का क़ब्ज़ा हो जाता है।

इस तरह यूरोपियों के पूर्व (चीन, भारत और पूर्वी अफ़्रीक़ा) के व्यापार का रास्ता (समुंद्री और ज़मीनी) पूरी तरह से मुस्लिम हाथों में चला जाता है और समूचे मध्य-पूर्व पर मुस्लिम शासकों का कब्ज़ा हो जाता है। पूर्व (चीन, भारत और पूर्वी अफ़्रीक़ा) से आने वाले रेशम, मसालों और आभूषणों पर अरब और अन्य मुस्लिम व्यापारियों का कब्जा हो गया था – जो मनचाहे दामों पर इसे यूरोप में बेचने लगे।

फ़तह के पहले और बाद में कई यूनानी एवं अन्य दानिशवर लोग कु़स्तुन्तुनिया छोड़कर भाग निकले। इनमें से ज़्यादातर इटली जा पहुँचे जिससे यूरोपीय पुनर्जागरण को बहुत ताक़त मिली और योरप के लोग जागरुक होने लगे और इसके बाद स्पेनी और पुर्तागली (और इतालवी) शासकों को मशरिक़ (पूर्व) के रास्तों की बैहरी (सामुद्रि) जानकारी की इच्छा और जाग उठती है ।

1475 की शुरुआत से यूरोपीय देशों की नौसेना के उरुज को देखा गया. इसी सिलसिले मे अमरीका की खोज क्रिस्टोफर कोलम्बस ने 12 अक्तुबर 1492 की थी और वास्को डी गामा कप्पड़ पर कालीकट के निकट 20 मई 1498 ईस्वी को भारत में आया था. इसी दौर मे समुद्र रास्ते से दुनिया का चक्कर लगानेवाला पहला आदमी मैगलन बना था. और फिर इसके बाद शुरु हुआ योरप के साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का नंगा नाच जो आज तक जारी है।

#29May1453 को हुए इस अज़ीम वाक़िये का असर हिन्दुसान पर भी हुआ और योरप के साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का नंगा नाच को अमली जामा पहनाने लोग युरोप हिन्दुस्तान आने लगे, गोवा, कालीकट पर हमला कर क़ब्ज़ा किया फिर जो हुआ वो सबको पता है।

पहली जंग ए अज़ीम यानी First World War के बाद 13 November 1918 से 23 September 1923 तक ये शहर ब्रिटिश, फ़्रंच और इटेलियन फ़ौज के क़ब्ज़े मे रहा जिसे हम #OccupationofConstantinople के नाम से जाना जाता है

#UlubatlıHasan #SultanMehmedII #OttomanEmpire #TurkishMartyr #SiegeofConstantinople #Constantinople

Md Umar Ashraf

मदीना का मुहाफ़िज़ आशिक़ ए रसूल ‘ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा’

 
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मदीना अरब का एक मुक़द्दस शहर है जो के पहली जंग ए अज़ीम के दौरान एक तवील महासरे से गुज़रा, उस वक़्त मदीना सल्तनत उस्मानिया का हिस्सा था। इस वक़्त सल्तनत उस्मानिया ने मरक़ज़ी ताक़तो का साथ दिया था। शरीफ़ मक्का ने सल्तनत उस्मानिया से ग़द्दारी की और ख़लीफ़ा के ख़िलाफ़ बग़ावत का झंडा बुलंद कर दिया, जिसमे लारेँस आफ़ अरेबिया का हाथ था। शरीफ़ मक्का ने मक्का पर क़ब्ज़ा करने के बाद मदीना का महासरा शुरु किया। मदीना का महासरा तारीख़ के तवील महासरे मे से एक था जो के जंग के बाद भी जारी रहा। जहां अंग्रेज़ प्रस्त शरीफ़ मक्का के पास 1916 मे 30000 सिपाही थे, वहीं ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ने 3000 सिपाहीयों की मदद से मदीना का दफ़आ किया, उनकी जुरायतमंदी और हौसले की वजह कर उनके चाहने वाले उन्हे शेर ए सेहरा कहते थे, 10 जुन 1916 से 10 जनवरी 1919 तक चलने वाला ये महासरा 2 साल और 7 महीना तक जारी रहा, उस समय तक यानी 1918 तक अंग्रेज़ प्रस्त शरीफ़ मक्का के पास 50,000 से अधिक सिपाही हो चुके थे, वहीं ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा के पास 11000 जांबाज़ सिपाही थे।

ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा की पैदाईश 1868 मे रयूस, बुल्गारिया मे हुआ था जो सल्तनत उस्मानिया का हिस्सा हुआ करता था, 1877 मे हुए तुर्क-रशियन जंग के वजह कर इनका पुरा ख़ानदान क़ुस्तुन्तुनिया मे जा बसा, यहीँ ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ने 1888 मे उस्मानी वार अकेडमी से ख़ुद को जोड़ा और यहीं से ग्रेडुएशन किया, उनकी पहली पोस्टिंग चौथी सेना मे पुरवी सरहद पर हुई जो के अरमानिया से लगती थी, 1908 मे ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा वापस क़ुस्तुन्तुनिया आ गए और पहली फ़ौजी दस्ते का हिस्सा बने. 1911–12 मे लीबिया भेज दिये गए फिर बालकन जंग मे आप 31वें डिवीज़न के कमांडर के हैसियत से गैलीपौली मे रहे और आपकी ही फ़ौजी युनिट ने बुलग़ारिया से ‘एडरिन’ नाम के तारीख़ी शहर को दुबारा छीना और इस शहर मे उस्मानी वज़ीर ए जंग अनवर पाशा के साथ दाख़िल हुए.

1914 मे 12वीँ बटालियन के कमांडर के हैसियत से मोसुल मे रहे, फिर प्रमोशन दे कर मेजर जनरल बना दिये गए और 12 नवम्बर 1914 को चौथी फ़ौज के डिप्टी कमांडर बना कर अलप्पो भेज दिये गए.

1st world war के दौरान 23 मई 1916 को अहमद जमाल पाशा के हुक्म पर ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा हेजाज़ के लिए निकल पड़े जहाँ जा कर उन्हे मदीना की हिफ़ाज़त करनी थी, 17 जुलाई 1916 को हेजाज़ इक्सपिडेशनरी फौज के कमांडर मुक़रर्र कर दिये गए…

10 जुन 1916 को शरीफ़ मक्का जिसने सल्तनत उस्मानिया से ग़द्दारी की और ख़लीफ़ा के ख़िलाफ़ बग़ावत का झंडा बुलंद कर दिया था ने अपने बेटे फ़ैसल, अब्दुल्लाह और अली की क़ियादत मे ब्रीटेन की मदद से 30 हज़ार सिपाही के साथ पुरी तरह मदिना को घेर लिया पर ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ज़रा भी न घबराए और उन्होने उनसे अपने 3000 वफ़ादार सिपाहीयों को साथ लोहा लेना शुरु किया.

ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ने ना सिर्फ़ मदीना मुनव्वरा की हिफ़ाज़त की बलके हेजाज़ रेलवे ट्रैक की हिफ़ाज़त भी की जिसपर लारेँस आफ़ अरेबिया को क़ियादत मे लगातार हमला किये जा रहे थे. सिर्फ़ 1917 मे 130 से अधिक बड़े हमले किये गए और हज़ारो की तादाद मे हमले 1918 मे हुए जिसमे सिर्फ़ 300 से अधिक बम 30 अप्रील 1918 को छोडे गए. पर ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा नाम ये मुजाहिद जो अपने वक़्त का सबसे बड़ा अशिक ए रसुल(स) था ने कभी पीछे मुड़ कर नही देखा. नबी(स) के शहर मदीना पर हो रहे हमले का मुंह तोड़ जवाब देते रहे यहां तक के 30 October 1918 को जब Armistice of Mudros का समझौता हुआ तब भी उन्होने लोहा लेना नही छोड़ा. इस वक़्त तक अंग्रेज़ के पिट्ठु काफ़ी नुक़सान उठा चुके थे.

इसी बीच आने वाले बड़े ख़तरे को भांपते हुए 14 मई 1917 उन्होने मदीना की तमाम पाकीज़ा चीज़ जिसमे हुज़ुर अक़दस मुहम्मद सलल्लाहो अलैह ए वसल्लम के कुछ क़ीमती सामान भी थे को एक स्पेशल ट्रेन से इस्तांबुल भेजा.

शरीफ़ मक्का और उसके लोगो ने सोचा की ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा अब हथियार डाल देगा पर एैसा कुछ हुआ नही उलटे उन्होने उस्मानियो और ब्रिटेन के बीच हुए Armistice of Mudros के समझौते को ही मानने से इनकार कर दिया.

तुर्की के मारुफ़ मुसन्निफ़ “फ़रिदीन कंदमेर” ने अपने आंखो देखा हाल हाल कुछ इस तरह लिखा है जो उस वक़्त उस्मानी रेड क्रिसेंट वालेंटियर की हैसयत से मदीना मे मुक़ीम थे, वो लिखते हैं की मौसम ए बहारा के जुमा के नमाज़ के बाद ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा कुछ इस तरह सिपाहीयों को ख़ेताब करते हैं :-

सिपाहीयों !!
मैं नबी करीम मुहम्मद सलल्लाहो अलैह ए वसल्लम के नाम पर तुमसे अपील करता हूँ, और ये हुक्म देता हूँ कि दुश्मन की ताक़त की परवाह किये बग़ैर अपनी अाख़री गोली- अाख़री सांस तक नबी करीम मुहम्मद सलल्लाहो अलैह ए वसल्लम और उनके शहर की रक्षा करो.
अल्लाह की मदद और नबी मुहम्मद सलल्लाहो अलैह ए वसल्लम की दुआएं हमारे साथ हों.

“जाबाज़ उस्मानी फ़ौज के अफ़सरों !!
हे मुहम्मद (स.) के मानने वालों, आगे आओ और अल्लाह और उसके रसूल से वादा करो, कि अपने जानों की क़ुरबानी देकर तुम अपने दीन और मज़हब का मान रखोगे.”

ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ने ये दावा किया था कि उन्हे नबी करीम मुहम्मद सलल्लाहो अलैह ए वसल्लम के दीदार हुआ, और उन्हीन हीे हथियार ना देने का हुक्म दिया है.

August 1918 मे शरीफ़ हुसैन मक्का ने ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा को हथियार डालने को कहा तो उन्होने कुछ इन लफ़्ज़ो मे जवाब दिया :-

“जनरल, फ़ख़रुद्दीन, पाक शहर मदीना के रक्षक, नबी करीम मुहम्मद सलल्लाहो अलैह ए वसल्लम का ग़ुलाम.”

“अल्लाह के नाम से, जो सर्वशक्तिमान है.
वो जिसने इस्लाम की ताक़त को तोड़ दिया, मुसलमानों के बीच खून ख़राबा करवाया, अंग्रेज़ों के वर्चस्व के सामने अमीरुल मोमिनीन की ख़िलाफ़त को ख़तरे में डाला.”

* “ज़िल्हिज्जा की 14 तारीख़, गुरुवार रात को जब मैं थका-मांदा, मदीना की हिफ़ाज़त के बारे में सोचता हुआ चलता जा रहा था, तब मैं एक छोटे से चौराहे पे पहुंचा जहाँ कुछ अंजान लोग काम कर रहे थे.

तभी मैंने एक नूरानी चेहरे वाले आदमी को मेरे सामने खड़ा पाया.
वो नबी थे, सल्ललाहु अलैही वसल्लम.
उनका बायाँ हाथ उनकी कमर पर था, उन्होंने बड़े प्यार से मुझसे कहा – मेरे साथ आओ.
मैं 2-3 क़दम उनके साथ चला, और फिर नींद खुल गई.
मैं तुरंत हरम-ए-पाक मस्जिद नबवी गया और उनके रौज़े के नज़दीक सजदा-ए-शुक्र में गिर गया.” *

” अब मैं अपने सुप्रीम कमांडर, अपने नबी करीम मुहम्मद सलल्लाहो अलैह ए वसल्लम के संरक्षण में हूँ. अब मैं अपने गढ़ को मज़बूत करने, मदीना की सड़कों और चौराहों को मज़बूत बनाने में लगा हूँ. मुझे बेकार चीज़ों से तंग मत करो.

ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ने उस्मानी वज़ीर ए जंग के हुक्म को भी मानने से इनकार कर दिया जिसमे उन्हे हथियार डालने का हुक्म दिया गया था.

उस्मानी हुकुमत इनके इस रवइये से काफ़ी नाराज़ हो गई और सुलतान मेहमद VI ने उन्हे उनके ओहदे से हटा दिया, पर उन्होने ये भी मानने से भी इनकार कर दिया और सल्तनत उस्मानिया के झंडे को लगातार उठाए रखा यहां तक के जंग ख़्तम होने के 72 दिन के बाद तक. जबके 30 October 1918 को हुए Armistice of Mudros के समझौते के बाद सबसे नज़दीकी उस्मानी फ़ौज की युनिट मदीना से 1300 km दुर थी.

चुंकी सपलाई बंद हो चुकी थी, खाने पीने की कमी के वजह कर उस्मानी फ़ौज को फाक़े से रहना पड़ रहा था, टिड्डे तक को खाना पड़ा, आख़िर मे भुख और अमदाद की कमी को वजह कर 10 जनवरी 1919 को ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ने ख़ुद को अपने ही लोगो से गिरफ़्तार करवा कर बीर दरविश मे शरीफ़ मक्का के बेटे अबदुल्लाह के सामने पेश कर दिया.

इस हादसे के बाद ही शरीफ़ मक्का का बेटा अबदुल्लाह 13 जनवरी 1919 को मदीना मे दाख़िल हुआ और पीछे से 2 फ़रवरी 1919 को शरीफ़ मक्का का दुसरा बेटा अली मदीना मे दाख़िल हुआ.

इस बीच शरीफ़ मक्का के लोगो ने 12 दिन तक मदीना को जम कर लुटा और उन 4850 घरों को ज़बरदस्ती खोल कर लुटा गया जिन्हे ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा ने सील कर बंद किया था.

फिर ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा को उनके 8000 लोगो के साथ गिरफ़्तार कर मिस्त्र के फ़ौजी अड्डे मे लाया गया जिसमे 519 अफ़सर थे और 7545 सिपाही थे, इनमे कई बिमारी से मर गए और कईयो को उनके इलाक़े मे भेज दिया गया और फिर ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा को मालटा की जेलों मे भेज दिया गया.

एक क़ैदी की हैसियत से मालटा मे 2 सालो तक रहे फिर 1921 मे रिहा हो कर तुर्क फ़ौज का हिस्सा बने जिसका सरबराह मुस्तफ़ा कमाल पाशा था.

फिर 1922 से 1926 तक काबुल अफ़ग़ानिस्तान मे तुर्की के राजदुत की हैसयत से अपनी सेवाएं दी फिर 1936 तो प्रामोशन देकर लेफ़टिनेंट जनरल बना दिये गए और फिर इसी ओहदे के साथ फ़ौज से रिटाएर हो गए.

80 साल की उम्र मे 22 नवम्बर 1948 को एक सफ़र के दौरान आए दिल के दौरे ने इस दुनिया से हमोशा के लिए ओमर फ़ख़रुद्दीन पाशा को रुख़सत होने पर मजबुर कर दिया. इन्हे एसयान सेमेटरी इंस्तांबुल मे दफ़नाया गया.

Md Umar Ashraf

अगर क़ासिम भाई मदद नही करते तो शायद यह नही लिखा पाता 👌✊

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अमेरिका से मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली के क़बर की मिट्टी भारत कब वापस आएगी ?

 

मौलाना #Barkatullah_Bhopali का आख़री सफ़र ⬇

राजा महेंद्र प्राताप लिखते हैं :- 28 अप्रील 1925 को अमेरिका मे ग़दर पार्टी के जानिब से उन्हे दो हज़ार डालर दिए गए, जिनमे से एक हज़ार मौलाना बरकउल्लाह भोपाली के लिए, पांच सौ रास बिहारी बोस के लिए और बाक़ी के दीगर इंक़लाबीयों के लिए.. टोकियो मे मै रास बिहारी बोस से मिल कर जर्मनी पहुंचा और मौलाना के पास ठहरा और वो रक़म उनको दी, वोह आगे लिखते हैं के 1927 मे मुझे मौ़लाना बरकतुल्लाह भोपाली का ख़त के मै जर्मनी आ कर उनसे मिलुं .. जब मै जर्मनी पहुंचा तो मौलाना बहुत ही कमज़ोर और बिमार थे, मै उनके क़रीब एक कमरे मे ठहरा .. जब हम मिले तो बाते ही बातें करते चले गए .. रात भर बीते हुए दिनों, गुज़रे हुए वाकय़ात की यादें और इस क़दर कमज़ोरी और बिमारी के बावजूद फिर वही अज़्म ओ जवां के साथ अईंदा के प्रोग्राम पर चर्चा…

जुन 1927 मे मौलाना बरकउल्लाह भोपाली ने अपने साथियों के बीच ये तजवीज़ रखी के इन लोगों को एक बार फिर अमरीका के दौरे पर चलना चाहीये और अपने पुराने साथियों से मिल कर कोई नया प्रोग्राम तय करना चाहीये .. मौलाना बरकउल्लाह ने जर्मन फ़ारेन ऑफ़िस से बात चीत कर 3000 मार्क हासिल कर लिया जिसमे 2000 ख़ुद रख बाक़ी हज़ार राजा माहेंद्र प्राताप को सौंप दिया … मौलाना बरकउल्लाह ने जर्मन विज़ा पर अमेरिका के लिए पासपोर्ट हासिल कर लिया वहीं राजा माहेंद्र प्राताप के पास अफ़गानिस्तान का पासपोर्ट था.. फिर कुछ दिन बाद जर्मन जहाज़ पर सवार हो कर ये दोनो अमेरिका के लिए चल दिये .. चुंके मौलाना बरकउल्लाह को डाईबेटीज़ था इस वजह कर वोह पुरे सफ़र मे काफ़ी परेशान रहे और उनकी सेहत लगातार गिरती ही जा रही थी पर वोह अपने मुल्क और वतन की ख़ातिर इस इम्तेहान से गुज़र गए .. न्यु यार्क पहुंच मौलाना बरकउल्लाह और राजा माहेंद्र अपने जाने पहचाने होटल टाईम स्कॉयर मे ठहरे .. हिन्दुस्तानी दोस्तों ने गर्मजोशी से इस्तक़बाल किया .. 15 जुलाई 1927 को इन दोनो के अमरीका आने की ख़ुशी मे एक प्रोग्राम सलोन इण्डयाना सराय (Cylon India inn) 149 Dilite 49 Street मे किया गया और इसके इलावा और भी कई इस्तक़बालिया जलसे हुए .. एक जलसे मे डॉ सैयद हुसैन, मौलाना बरकउल्लाह और राजा माहेंद्र मुक़रर्रि की हैसियत से शरीक हुए .. इस मौक़े पर इन लोगो की मुलाक़ात डॉ बसंत राय से हुई जो बाद मे इनके मुख़लिस दोस्त साबित हुए .. डॉ राय ने इन लोगों की मुलाक़ात अमरीकन हब्शी (नेग्रो) के सबसे बड़े लीडर Hom Marcus Gorvey से करवाई और उनके जलसे मे मौलाना बरकउल्लाह ने तक़रीर भी की .. इसके बाद मौलाना बरकउल्लाह राजा माहेंद्र को अपने आईरिश इंक़लाबी दोस्तों से मिलवाने Gaelik American ले गए … पैसे ख़त्म हो चुके थे फिर वहां उन्हे 200 डॉलर की माली मदद मिली.. ये मदद हिन्दुस्तान नेशनल पार्टी के सदर सरदार गोपाल सिंह के कहने पर चौधरी मेहंदी ख़ान ने हिन्दुस्तान नेशनल पार्टी के सिक्रेट्री शेर सिंह से पहुंचवाया था .. इसके बाद मौलाना बरकउल्लाह और राजा माहेंद्र Detroit पहुंच गए .. यहां आबाद हिन्दुस्तानीयों ने इन दोनो का इस्तक़बाल इन्टरनेशनल हाऊस मे किया और इन लोगों से “हिन्दुस्तान की जंग ए आज़ादी मे हिन्दुस्तानी छात्रों के फ़राएज़” के मौज़ु पर इज़हार ए ख़्याल करने का दरख़्वास्त किया गया जिसे इन लोगों ने क़बूल कर लिया …

मौलाना बरकउल्लाह और राजा माहेंद्र के लिए Detroit और Gray मे आबाद हिन्दुस्तानीयों ने पलकें बिछा दीं .. यहीं इन लोगों की मुलाक़ात मौलाना बरकउल्लाह के पुराने दोस्त इंक़लाबी आईरिश लीडर Capt Mantieth से हुई .. जब ये लोग यहां से कैलिफ़ार्निया के लिए रवाना होने लगे तो हिन्दुस्तानीयों ने एक बड़ी रक़म थैली मे कर मौलाना बरकउल्लाह के हांथ मे दे दी ताके ये लोग आराम से सफ़र कर सकें.. इसके बाद ये लोग Gari मे ठहरे जहां इनकी मेज़बानी Mrs Zenolia H. Bagy ने की जो SUN अख़बार की इडिटर थीं .. यहां भी तक़रीर का दौर जारी रहा .. यहां से ये लोग शिकागो पहुंचे जहां मौजूद हिन्दुस्तानी इन लोगों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे .. इसके बाद आख़िर ये लोग कैलिफ़ारनिया पहुंच ही गए जहां ग़दर पार्टी के नुमाईमदों इन लोगों का शानदार इस्तक़बाल किया .. मौलाना बरकउल्लाह की ख़्वाहिश को नज़र मे रखते हुए ग़दर पार्टी के दफ़्तर योगांतर आश्रम को 5 wood Street SanFrancisco मे क़ायम किया गया … कुछ दिन बाद मौलाना बरकउल्लाह राजा माहेंद्र के साथ सैंस फ़्रांसिस्को आए .. लोगों का हुजूम उनके इस्तक़बाल के लिए रेलवे स्टेशन पर उमड़ पड़ा .. जैसे ही मौलाना ने अपना पहला क़दम बाहर रखा पुरा इलाक़ा नारों की आवाज़ से गुंज उठा .. लोगों ने उनसे हॉस्पीटल चलने की दरख़्वास्त की तो उन्होने ग़दर पार्टी के दफ़्तर योगांतर आश्रम जाने की बात की .. वजह पूछने पर जवाब मिला के योगांतर आश्रम ही वोह मुक़द्दस स्थान है जहां से सैकड़ो हिन्दुस्तानी वतन की राह मे क़ुरबान हुए और मुझे इस जगह से दिली लगाव है.. इसके बाद राजा माहेंद्र के साथ मौलाना एक मोटर पर बैठ आश्रम की जानिब चल दिये .. यहां मौलाना के लिए खाना ख़ुद राजा माहेंद्र प्राताप बनाया करते थे और बाद ये ज़िम्मेदारी चौधरी मेंहदी ख़ान को दे दी गई .. चौधरी एक ज़मींदार थे एक ज़माने मे इससे लाखो रुपैय कमाया पर मुल्क की आज़ादी की ख़ातिर राजा माहेंद्र प्राताप की तरह पुरी दुनिया के दर भटक रहे थे .. उन्होने मौलाना की बहुत ख़िदमत की पर उनके सेहत मे कोई सुधार नही हो पा रहा था .. उसी दौरान डॉ सैयद हुसैन लॉस ऐंजलिस मे एक लेकचर दे रहे थे , उन्हे तार भेज पुरे हालात की ख़बर दी गई और उन्हे बुलाया गया .. वोह तीसरे रोज़ ही तशरीफ़ ले आए .. और मौलाना साहेब से उनका पुरा चार्ज ले लिया..

मौलाना बरकतउल्लाह भोपाली के बिमारी मे थोड़ा सुधार हुआ तो उनके एज़ाज़ में केलिफ़ौरनिया के शहर मरज़ील मे एक ज़बरदस्त जलसा हुआ जिसमे आठ सौ से अधिक हिन्दुस्तानी मौलाना को सुनने के लिए जमा हुए थे, जो मौलाना के इस्तक़बाल का आख़री जलसा साबित हुआ..

आज़ाद ए हिन्द की पैंतालीस साला मुसलसल जद्दोजेहद ने उनकी हड्डीयों को घुला दिया था, ख़िदमत ओ मुल्क ओ मिल्लत के तपते हुए सेहराओं और ख़ुश्क चटियल फैले हुए मैदानों पर चलने वाले मुसाफ़िर की अब मंज़िल क़रीब आ चुकी थी, जान ओ तन का रिश्ता अब भी ज़रुर क़ायम था लेकिन रुह अफ़लाकी अब जिस्म ख़ाकी को छोड़ने के लिए बेक़रार थी.. ज़ईफ़ ओ कमज़ोरी इंतहा को पहुंच चुकी थी, वोह गोश्त ओ पोश्त का मजमुआ बेहद ज़ईफ़ और हद दर्जा लाग़र हो चुके थे, गुंजते हुए नारों के दरमियान और तालियों के गूंज मे वोह शुजाअत ओ हिम्मत का मुजस्समा, हुर्रियत ओ आज़ादी का सिपाही, अज़्म ओ हौसला का सहारा ले कर खड़ा हुआ और अपने वतनी भाईयों की मौजूदगी मे कांपते हुए होटों से शुक्रीया के अल्फ़ाज़ निकले और हवाओं की लहरों मे बिखर गए..

महफ़िल मै मौजूद भीड़ मुसर्रत और ख़ुशी से झुम उठी पर जज़बात ने ज़ुबान पर मोहर लगा दी.. वोह तेज़ो तरार ज़ुबान जो अंग्रेज़ी सम्राज्य के ख़िलाफ़ चलती हुई तलवार की तरह काट करती थी उसको चुप सी लग गई, अब ज़बान का काम आंखो ने अंजाम देना शुरु किया.. मौलाना की पलकों से होते हुए आंसु आंखो से टपक कर ज़मीन पर गिरने लगे, जिनकी आब ओ ताब मे हिन्दुस्तान का सुनहरा मुस्तक़बिल दमक रहा था..

अपने इस पुराने ख़ादिम, बुढ़े इंक़लाबी की मुजाहिदाना कारनामों और अज़ीम सरगर्मियों के बारे मे जानने वाले हिन्दुस्तानी उनकी इस हालत को देख कर बहुत ही दुखी होते हैं, और पुरे महफ़िल मे मानो मातम के बादल छा जाते हैं, बेइख़्तियाराना आह की सदाएं बुलंद हुई और पुरा मंज़र सिसकियों और हिंचकीयों से गुंज उठा .. महफ़िल मे बैठे तमाम लोग रोने लगे.. मौलाना ने दोस्तों और जांनिसारो के इस ख़ुलूस ओ मुहब्बत को गेख ख़ुद को संभाला और शुक्रिया अदा किया … बोलने की कोशिश की पर बोल न सके .. आख़िर राजा साहेब को इशारा कर तक़रीर करने के लिए बुलाया और ख़ुद कुर्सी पर बैठ गए .. ये इस बुज़ुर्ग इंक़लाबी का ज़िन्दगी मे आख़री दीदार था, यहां ले मौलाना को अस्पताल ले जाया गया और रूसी डॉकटर ने ईलाज किया और सारा ख़र्च ग़दर पार्टी ने ख़ुद उठाया .. ईलाज होता गया और मर्ज़ बढ़ता गया .. अब हांथो मे वो ताक़त ओ जुम्बिश न रही पर आंखो मे दम बाक़ी था..

27 सितम्बर 1927 बरोज़ मंगल की रात मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली की आख़री रात थी, उस समय वोह अपने पुरे होश ओ हवास मे थे, और उस वक़्त अपने कुछ साथियों के सामने जो उस समय उनके बिस्तर के पास मौजुद थे से कुछ बात कही जो कुछ इस तरह थे :-

तमाम ज़िन्दगी मै पुरी ईमानदारी के साथ अपने वतन की आज़ादी के लिए जद्दोजेहद करता रहा, ये मेरी ख़ुशक़िसमती थी के ये मेरी नाचीज़ ज़िन्दगी मेरे प्यारे वतन के काम आई. आज इस ज़िन्दगी से रुख़सत होते हुए जहां मुझे ये अफ़सोस है के मेरी ज़िन्दगी मे मेरी कोशिश कामयाब नही हो सकी वहीं मुझे इस बात का भी इतमिनान है के मेरे बाद मेरे मुल्क को आज़ाद करने के लिए लाखो आदमी आज आगे बढ़ आए हैं, जो सच्चे हैं, बहादुर हैं और दाबाज़ हैं.. मै इतमिनान के साथ अपने प्यारे वतन की क़िसमत उनके हांथो मे सौंप कर जा रहा हुं…

मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली का इंतक़ाल हो चुका था और उनके चाहने वाले का बुरा हाल था, मौलाना के इंतक़ाल की ख़बर बिजली की तरह पुरे अमेरिका मे फैल गई और अमरीका मे मौजूद हिन्दुस्तानीयों के दिलो पर रंज ओ ग़म के बादल छा गए .. थोड़ी देर मे प्रेस एसोसिएशन ऑफ़ अमेरिका ने इस ख़बर को पुरे युरोप और एशिया मे फैला दिया .. जहां जहां हिन्दुस्तानीयों को ये ग़मंगेज़ी ख़बर पहुंची उन्होने मौलाना के मतम मे अपने कारोबार को बंद कर दिया ..

पांच दिन तक मौ़लाना बरकतुल्लाह भोपाली को हिफ़ाज़त के साथ रखा ताके उनके चाहने वाले उनका दीदार कर सकें फिर उनको दफ़न कर दिया गया जिस बारे मे आरज़ी हुकुमत ए हिन्द (1915) के राष्ट्रपति रहे राजा महेन्द्र प्रताप लिखते हैं :- इस जिगर सोज़ नाज़ुक मौक़े पर मैने मौलाना साहेब के बहैसियत क़रीब क़रीब दोस्त और वारिस होने की हैसियत से तजहीज़ो तकफ़ीन के फ़राएज़ अंजाम दिये.. उन आख़री रसमों मे हिन्दु, मुसलिम और सिख बराबर के शरीक थे.. हर एक ने अपने मज़हबी अक़ीदा के मुताबिक़ रसोमात अदा कीं.. ये बड़ा यौादगार दिन था.. डॉ सैयद हुसैन, डॉ रहमत अली, यौरी सिंह, राम सिंह सहीत सैकड़ो हिन्दुस्तानी अपने इस अज़ीम इंक़लाबी रहनुमा को ख़िराज ए अक़ीदत पेश करने जमा हुए थे.. चेहरा ऩुमाई ख़त्म होने पर सैकड़ों सिसकियों और अश्कबार आंखो के साथ उनके ठेंडे पड़े बदन को एक क़ीमती संदूक़ मे बंद कर के Sacramento से Maryville पहुंचया गया.. और वहां के मुसलिम क़ब्रिस्तान मे ये कह कर दफ़न कर दिया के हिन्दुस्तान के आज़ाद हो जाने पर तुम्हारी ख़ाक को हिन्दुस्तान पहुंचा दिया जाएगा.. आख़री रसम मौलवी रहमत अली, डॉ सैयद हुसैन, डॉ औरंग शाह और राजा महेन्द्र प्रताप ने मिल कर अदा कीं और इस अज़ीम इंक़लाबी अमेरिका की सरज़मीन मे सुपुर्द ए ख़ाक कर दिया गया..

जैसे ही मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली के इंतक़ाल की ख़बर हिन्दुस्तान एसोसिएशन ऑफ़ सेंट्रल यौरप के दफ़तर बर्लिन मे पहुंची फ़ौरन एक ताज़ियाती जलसा किया गया, चुंके एसोसिएशन मे काम करने वाले अधिकतर लोग मौलाना के साथी थे. इस जलसे को ख़िताब करने वालो में दुनिया के छ: मुल्क के नुमाईंदे थे.. हिन्दुस्तानयों के इलावा मौलाना को ख़िराज ए अक़ीदत पेश करने वालों मे जर्मन , रुस , ईरान , अफ़ग़ानिस्तान और तुर्की के नुमाईंदों मौजूद थे.

डॉ मंगल मुर्ती लिखते हैं :- “छ: मुल्क के नुमाईंदो ने इस जलसे मे हिस्सा लिया और सभी ने मौलाना मरहुम को ईसार ए मुजस्सम व शहीद ए इंक़लाब कह कर ख़िराज ए अक़ीदत पेश किया और आज़ादी के नाम पर हिन्दुस्तान के इस बहादुर सपूत की बेहद तारीफ़ ओ तौसीफ़ की.”

सोवियत रूस के नुमाईंदे ने अपनी तक़रीर मे कहा :- हिन्दुस्तान की आज़ादी लड़ाई लड़ने वालों के साथ सोवियत युनियन को पुरी पुरी हमदर्दी है, जंग ए आज़ादी में काम आने वाले सभी शहीदों की सोवियत रूस इज़्ज़त करता है. सोवियत नुमाईंदे की हैसियत से मै मौलाना बरकतुल्लाह की याद मे मै अपना नज़राना ए अक़ीदत पेश करता हुं.

ईरानी नुमाईंदे ने मौलाना बरकतुल्लाह की याद मे अपना नज़राना ए अक़ीदत पेश करते हुए कहा :- बरकतुल्लाह का इंतक़ाल हो गया लेकिन उनका ये जज़्बा ए आज़ादी लाफ़ानी है, वोह हमेशा लाफ़ानी रहेगा.. सभी इंक़लाबी की बैनुलक़्वामी शकल होती है, कोई इंक़लाब एक मुल्क या एक ख़ित्ता मे महदुद नही रहता है, बल्के वो तमाम मुल्क को मुतास्सिर करता है, इस लिए किसी भी मुल्क के इंक़लाबी शहीद को सारी दुनिया के आज़ाद पसंद लोग अपना शहीद मानते हैं और इसी लिए उससे मुहब्बत करते हैं, उसकी इज़्ज़त करते हैं और अक़ीदतमंदी के साथ उसे याद करते हैं, ये शहीद आज़ादी के उस रास्ते की तख़लीक़ करते हैं जिस पर जल्द या देर दुनिया की सारी क़ौमों को चलना है, अगर ये शहीद ऩ होते तो दुनिया एक अंधेरी जगह बन जाती ..

एक हिन्दुस्तानी मुक़ररिर ने जल्से की कारवाई को ख़त्म होने से पहले ये एलान किया :- मौलाना बरकतुल्लाह का क़ुरबानी बेकार नही गई, ये सही है के उनकी ज़िन्दगी मे उनका ख़्वाब पुरा न हो सका, फिर भी उनकी ज़िन्दगी एक ज़र्रीं रौशनी फैलाने वाले चिराग़ की तरह रहेगी जिसकी रौशनी मे हिन्दुस्तान के लाखो नौजवान आज़ादी के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे .. जबके करोड़ो से खेलने वाले कारोबारी जो बड़ी बड़ी रक़में कमा कर कोठीयां खड़ी करते रहे और अपने पेट व ख़ज़ाने भरते रहे ख़ाक मे मिल जाएंगे.. बरकतुल्लाह मरहूम हमेशा ग़ैरफ़ानी रहेंगे…

हिन्दुस्तान एसोसिएशन ऑफ़ सेंट्रल यौरप के सदर के आख़री अलफ़ाज़ थे :- ये सच है के अज़ीम इंक़लाबी मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली का वफ़ात हो चुका है, लेकिन ये भी सच है इंक़लाब ज़िन्दा है, और हमेशा जिन्दा ही रहेगा..

#Bring_Remains_of_Barkatullah_Bhopali_Back_To_India

#BarkatullahBhopali

Md Umar Ashraf

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बिहार मे 1857 की क्रांति, बाबू कुंवर सिंह और उनके मुस्लिम साथियों की वीर गाथा……

बिहार विद्रोहीयों की सरज़मीन रही है.. इस सरज़मीन ने ज़ालिम हुक्मरानों को हमेशा ललकारा है… जब मुग़ल अपने उरुज पर थे तब इसी बिहार के लाल ‘शेर शाह सूरी’ ने मुग़लो को उनके अज़ाएम मे नाकाम किया… जब अंग्रेज़ आए तो भला बिहारी कैसे ख़ामोश बैठ जाते ?

आपको मालूम होना चाहिए बंगाल के आख़री हुक्मरान नवाब सिराजुद्दौला की पैदाईश भी बिहार के पटना मे हुई थी, जहां वो काफ़ी दिनो तक रहे फिर जब 1757 मे अंग्रेज़ो के विरोध की बात आई तो सबसे पहले वही मैदान मे गए.. पर अपनो की ग़द्दारी की वजह कर बिना लड़े ही जंग हार गए और शहीद हो गए…

अंग्रेज़ों ने 1760 में बंगाल के नवाब मीर जफ़र को बेदख़ल कर उसके दामाद मीर क़ासिम को बंगाल की नवाबी दे दी। वह अंग्रेजों के अंतहीन लालच और हस्तक्षेप से तंग आ गया था। और वोह अंग्रेज़ो के चाल से बचने के लिए मुर्शिदाबाद को छोड़ उसने अपनी राजधानी मुंगेर बना लिया जो बिहार का हिस्सा है। अंग्रेज़ों से उसकी ठन गयी और इसने बिहारीयों की एक फ़ौज बना कर 1764 मे बक्सर मे अंग्रेज़ो से जंग लड़ा और हार गया, जिसके बाद बंगाल पूरी तरह अंग्रेज़ो के हिस्से मे चला गया।

इसके बाद बिहार मे जो उस समय बंगाल का हिस्सा था अंग्रेज़ मुख़ालिफ़ बहुत सारी बग़ावत हुई जिसके बारे में आम तौर पर लोगों को कुछ पता ही नही है.

और इसकी क़यादत बिहार के ही जमींदारों , हाकिमों , नवाबों , नौजवानों , क़बाईलीयों (जनजाति) , उलमाओं (मौलवी) , संन्यासी (संत) और खेतिहर लोग (किसान) लोगों ने की और मौक़ा देखते ही अंग्रेजों के खिलाफ़ अनेकों बार संघर्ष और विद्रोह किया। वैसे कई बार संघर्ष और विद्रोह ज़ालिम ज़मींदारों के ख़िलाफ़ भी हुआ जो अंग्रेज़ो के पिट्ठु थे. बिहार के आबाई लोगों के ज़रिया अंग्रेजों के खिलाफ़ संगठित और ग़ैरसंगठित तौर पर कई विद्रोह और आंदोलन चलाया गया।

बाक़ी इसमे वो कितने कामयाब हुए , वो बस इन दो लाईन मे समझ लीजिए :-

गिरते हैं शह – सवार ही मैदान ए जंग मे,
वोह तिफ़्ल क्या गिरें जो घुटनो के बल चले..

कुछ विद्रोह और आंदोलन के नाम इस तरह हैं.
सन्यासी तहरीक (आंदोलन), वहाबी तहरीक, नोनिया विद्रोह, लोटा विद्रोह, छोटा नागपुर का विद्रोह, तमाड़ विद्रोह, हो विद्रोह, कोल विद्रोह, भूमिज विद्रोह, चेर विद्रोह, संथाल विद्रोह, पहाड़िया विद्रोह, खरवार विद्रोह, सरदारी लड़ाई, मुण्डा विद्रोह, सफाहोड तहरीक, ताना भगत तहरीक…

इसी बीच आज के बंगाल(बंगलादेश भी) मे फ़राज़ी तहरीक अपने उरुज पर थी जिसे सिर्फ़ मज़हबी आंदोलन कहा जाता है जबके ये एक किसान आंदोलन था..
अक्सर यही पढ़ाया जाता है के हमने 1857 मे अंग्रेज़ो से बग़ावत की और हार गए जिसके बाद हमारा मुल्क हिन्दुस्तान ग़ुलाम बन गया और उसके बाद जंग ए आज़ादी की इबतिदा (शुरुआत) हुई.. जबके बिहार में 1757 ई. से ही ब्रिटिश मुख़ालिफ़ मुजाहिदा की शुरुआत हो चुकी थी। और ये जद्दोजेहद 1757 ई. से लेकर 1857 ई. तक बिहार के अलग अलग हिस्सों में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चलता रहा।

जब बिहार मे 1857 की क्रांति की बात होती है तो सिर्फ़ ‘बाबू कुंवर सिंह’ का नाम लिया जाता है.. उन्हे याद किया जाता है… ये सच है बिहार मे क्रांति की नुमाईंदगी कुंवर सिंह ने किया पर क्रांति की शुरुआत उन्होने नही की …
बिहार मे सबसे पहले 12 जून 1857 को देवधर ज़िले के रोहिणी नामक जगह पर अमानत अली, सलामत अली और शेख़ हारो बग़ावत कर अंग्रेज़ अफ़सर को मार देते हैं और इस जुर्म के लिए इन्हे 16 जून 1857 को आम के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी जाती है. और इस तरह बिहार मे क्रांति की शुरुआत होती है…

23 जुन 1857 को तिरहुत के वारिस अली को गिरफ़्तार कर लिया गया जिसके बाद सारे इलाक़े में क्रांति की लहर फैल गई।

3 जुलाई 1857 को दो सौ से अधिक हथियारबंद क्रान्तिकारी मुल्क को गु़लामी की ज़ंजीर से आज़ाद करवाने के लिये पटना में निकल पड़े, लेकिन अंग्रेज़ों ने सिख सैनिको की मदद से उन्हें हरा दिया। पीर अली सहित कई क्रांतिकारी पकड़ गये, इन्हे हथियार मौलवी मेहंदी ने फ़राहम कर दिया था..

उधर 6 जुलाई 1857 को तिरहुत के वारिस अली को बग़ावत के जुर्म मे फाँसी पर लटका दिया गया।

इधर 7 जुलाई, 1857 को पीर अली के साथ घासिटा, खलीफ़ा, गुलाम अब्बास, नंदू लाल उर्फ सिपाही, जुम्मन, मदुवा, काजिल खान, रमजानी, पीर बख्श, वाहिद अली, गुलाम अली, महमूद अकबर और असरार अली को बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया था।

पटना मे ही 13 जुलाई 1857 को पैग़म्बर बख्श, घसीटा डोमेन और कल्लू ख़ान समेत तीन लोगों को बग़ावत के जुर्म मे फांसी पर लटका दिया जाता है..

इन्क़लाबियों की इतनी बड़ी क़ुर्बानीयों की ख़बर सुनकर दानापुर की फ़ौजी टुकड़ी ने 25 जुलाई को बग़ावत कर दिया और वे बाबू कुंवरसिंह की फ़ौज से जाकर मिल गए।

इन्ही सबके बीच बाबु वीर कुंवर सिंह अपने सबसे ख़ास सिपहसालार काको (जहानाबाद) के शहीद काज़ी ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ां को कैथी लिपी मे ख़त भेजते हैं जिसे जसवंत सिंह ने लिख था को तशरीह (ट्रांसलेट – एलाब्रेट) करने के बाद मै इस नतीजे पर पहुंचता हुं..

प्रिये ज़ुल्फ़िक़ार

अब समय आ चुका है, मेरठ की जानिब कूच करो, जहां तुम्हारा इंतज़ार हो रहा है, सारे काम मुकम्मल कर लिये गए हैं. तुम होशियार भी हो और तुम्हे अपने काम मे महारत भी हासिल है.. हमारी फ़ौज भी तैयार है, और हमलोग यहीं से शुरुआत करेंगे और तुम वहां (मेरठ) से.. अंग्रेज़ी फ़ौज की तादाद कम है.. और आख़िर मे तुम्हारे जवाब का मुंतज़िर …. कुंवर सिंह ….

ख़त मिलते ही ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ां ने अपने कमांडर (कुंवर सिंह) के क़ौल पर लब्बैक कहा और मैदान ए जंग मे कूद पड़े.. इन्होने नगवां गाँव में राजपूत रेजिमेंट का गठन किया.. जहानाबाद ज़िले के इस रेजिमेंट ने मेरठ, गाज़ीपुर. बलिया जैसी जगहों पर छापामार युद्ध (गोरिल्ला वार) कर के अंग्रेज़ों को ख़ूब छकाया. और आख़िर आज़मगढ़ में अंग्रेज़ी फ़ौज के साथ हुए आमने सामने के जंग में ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ां अपने कई बहादुर साथियों के साथ शहीद हुए…

कुंवर सिंह के क़यादत (नेतृत्त्व) में दानापुर के बाग़ी फ़ौज ने सबसे पहले आरा पर धावा बोल दिया। इन्क़लाबियों ने आरा के अंग्रेज़ी ख़ज़ाने पर क़ब्जा कर लिया। जेलख़ाने के कैदियों को रिहा कर दिया गया। अंग्रेज़ी दफ़्तरों को ढाहकर आरा के छोटे से क़िले को घेर लिया। क़िले के अन्दर सिख और अंग्रेज़ सिपाही थे। तीन दिन क़िले की घेरेबंदी के साथ दानापुर से क़िले की हिफ़ाज़त के लिए आ रहे कैप्टन डनवर और उनके 400 सिपाहियों से भी लोहा लिया मुक़ाबला किया। और इस जंग मे डनवर को मार गिराया। बाक़ी बचे सिपाही दानापुर वापस भाग गये। इस तरह 27 जुलाई 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और दीगर साथियों के साथ मिलकर बाबु कुंवर सिंह ने सिर्फ़ क़िला बल्के पुरे आरा शहर पर ही कब्ज़ा कर लिया।

जिसके बारे मे 25 सितम्बर 1858 को पटना का कमिश्नर E. A. Samuells कोलकाता मे मौजुद अपने बड़े अफ़सर को ख़त लिखता है.. “बाबु कुंवर सिंह ख़ुद को मुल्क का बादशाह समझते हैं, वोह अंग्रेज़ी को कमज़ोर करने के लिए उन्ही के तर्ज़ पर अपना प्रशासन खड़ा कर हिकमत अमली के तहत इसमे अपने लोगों को ओहदा देना शुरु कर रहे हैं”.. कमिश्नर Samuells आगे लिखते हैं :- “बाबु कुंवर सिंह के द्वारा आरा मे की जा रही सारी हरकत बता रही है के उन्होने मान लिया है के उनकी हुकुमत क़ायम हो चुकी है.. और वोह उसी तर्ज़ एक एैसी सरकार वजूद मे लाना चाहते हैं जिसे हरा कर, कुचल कर वोह इस मुक़ाम पर पहुंचे हैं.. कुंवर सिंह ने आरा मे दो थाना क़ायम किया “पुर्वी थाना और पश्चिमी थाना” जिसकी देख रेख की पुरी ज़िम्मेदारी ‘शेख़ ग़ुलाम यह्या’ के हांथ मे मेजिस्ट्रेट बना कर दे दी गई.. मिल्की मोहल्ला आरा के ‘शेख़ मुहम्मद अज़ीमुद्दीन’ को पुर्वी थाना का जमादार बना दिया गया, तुराब अली और ख़ादिम अली जो के दीवान शेख़ अफ़ज़ल के बेटे थे को इन थाने कोतवाल बना दिया गया…

लेकिन यह कब्ज़ा लम्बे दिनों तक नही रह सका। मेजर आयर एक बड़ी फ़ौज लेकर 3 अगस्त 1857 को आरा पर चढ़ आया। जंग में कुंवर सिंह और उसकी छोटी सी फ़ौज हार गयी। आरा के किले पर अंग्रेज़ो का फिर से क़ब्ज़ा हो गया।

8 अगस्त 1857 को पीर अली ख़ान के साथी औसाफ़ हुसैन और छेदी ग्वाला को भी बग़ावत के जुर्म मे फांसी पर लटका दिया जाता है.. बाक़ी लोगों को काला पानी की सज़ा होती है..

बाबू कुँवर सिंह आरा और जगदीशपुर मे जंग हारने के बाद बिहार से बाहर अंग्रेज़ो पर हमला करना शुरु करते हैं. सितम्बर 1857 मे बाबू कुंवर सिंह की फ़ौज अंग्रेज़ो और उसके पिट्ठुओं के छक्के छुड़ाते हुए रिवह(रीवा) से आठ मील की दुरी पर पहुंच जाती है.. तब रीवा का राजा जो अंग्रेज़ो का वफ़ादार था ने क़िले का दरवाज़ा बन्द करने का हुक्म सुनाया तो वहां के दो क़द्दावर शख़्स “हशमत अली” और “हुरचंद राय” ने इसका विरोध किया जिस वजह कर राजा को ही क़िला छोड़ कर भागना पड़ा… फिर इन लोगो ने बाबू कुंवर सिंह को रास्ता दिखाया और उनकी फ़ौज का क़िले के अंदर इस्तक़बाल किया… इस तरह बिना ख़ुन बहाए ही बाबू कुंवर सिंह ने रीवा को जीत लिया….

उधर शेख भिखारी व टिकैत उमराव सिंह की वजह कर जंग ए आज़ादी की आग छोटानागपुर में फैल गयी. रांची, चाईबासा, संथाल परगना के ज़िलों से अंग्रेज़ भाग खड़े हुए. ये लोग जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से लगातार संम्पर्क मे थे..

अंग्रेज़ों ने शेख भिखारी व टिकैत उमराव सिंह को 6 जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ़्तार कर लिया और 7 जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फ़ौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख़ भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया.
8 जनवरी 1858 को आजादी के आलमे बदर शेख़ भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी..

उधर मोहसिनपुर के ज़मीनदार ‘मीर क़ासिम शेर’ अपनेे उस्ताद गु़लाम हुसैन ख़ान के कहने पर बाबु कुंवर सिंह की शहादत के बाद उनके छोटे भाई बाबु अमर सिंह की मदद करने के लिए रोहतास के जंगलो मे चले गए.. और अंग्रेज़ो पर कई बड़े हमले किये जिससे बौखलाए हुए अंग्रेज़ो ने मोहसिनपुर समझ यादवों के गांव मोसेपुर को पुरी तरह तहस नहस कर दिया जो ख़ुसरुपुर (फ़तुहा) के पास मौजुद है, चुंके मोहसिनपुर काफ़ी अंदर मे है, इस लिए कंफ्युज़न पैदा होना लाज़मी था..

गु़लाम हुसैन ख़ान जो अपने समय के सबसे बड़े लठैत माने जाते थे आज भी इनके नाम की लाठी बाजा़र मे मिल जाती है.. गु़लाम हुसैन ख़ान के बाबु कुंअर सिंह से बड़े अच्छे तालुक़ात थे, इन्हे सिपाहीयों को ट्रेनिंग देने के लिए बुलाया जाता था…

एक बात क़ाबिल ए ग़ौर है 1845 मे पटना का एक असफ़ल विद्रोह हुआ था जो होने से पहले ही दबा दिया गया था..

पटना में स्वतंत्रता संग्राम की तैयारियाँ वर्ष 1805 से ही प्रारम्भ हो गई थी। उस समय उलमाए सादिक़पुर की गतिविधियों का केन्द्र पटना ही था। जिसकी क़यादत इनायत अली, विलायत अली और दिगर लोग कर रहे थे. ये लोग अंग्रेज़ो और उसके पिठ्ठुओं से लड़ने के लिए मुजाहिदीन लड़ाको को तैयार कर ख़ुफ़िया तौर पर सरहदी इलाक़े(आज कल पाकिस्तान मे है) भेजा करते थे.

पर एक बड़े आंदोलन की चिंगारी सबसे पहले 1845 मे दिखी जब नेओरा के रहने वाले मुन्शी राहत अली ने पीर बख़्श और दुर्गा प्रासाद से मिल कर उन्हे अंग्रेज़ी फ़ौज के ख़िलाफ़ बग़ावत करने के लिए तैयार किया मगर रेजिमेंट के ही एक हवालदार ने अंग्रेज़ो के प्रती वफ़ादारी दिखाते हुए सारे राज़ खोल दिये जिसके बाद पीर बख़्श और दुर्गा प्रासाद गिरफ़्तार कर लिए गए. उनके पास से ज़मीनदारो और बा-असर लोगो के ख़त पकड़े गए जिसमे कई लोगो का राज़ खुल गया. इसमे कुछ ख़त बाबु कुंवर सिंह के भी थे. 27-12-1845 को पटना के कलेक्टर ने हुकुमत ए बंगाल के सिक्रेटरी को ख़त लिख कर ये इत्तेला दी के शाहबाद का एक ज़मींदार भी इस साज़िश मे मुलव्विस है जिसका मतलब बाबु कुंवर सिंह ही था..

पीर बख़्श और दुर्गा प्रासाद ने अपने जुर्म का एक़रार कर लिया और उनके बयान पर मुन्शी राहत अली , और पटना के शहरी ख़्वाजा हसन अली गिरफ़्तार कर लिए गए. इनदोनो पर मुक़दमा चला और फ़ैसला 1846 को आया पर इक़रारी मुजरिम (पीर बख़्श और दुर्गा प्रासाद) ने इन दोनो (मुन्शी राहत अली और ख़्वाजा हसन अली) को पहचानने से इनकार कर दिया जिस वजह कर ये लोग रिहा कर दिये गए. पर पीर बख़्श और दुर्गा प्रासाद सज़ा हुई. सज़ा के नाम पर इनके साथ क्या सलुक हुआ ये खोज का विषय है.

पटना के लॉ अफ़िसर मौलवी नियाज़ अली, सरकारी वकील बरकतउल्लाह और दरोग़ा मीर बाक़र को बरख़ास्त कर दिया जाता है… बाबु कुंवर सिंह-जगदीशपुर , मौलवी अली करीम-डुमरी और पुलिस जमीदार अपने कद्दावर असर की वजह कर बच गए…

गया के डुमरी वाले मौलवी अली करीम गोरखपुर मे अपने क्रांतिकारियों व सहयोगियों का नेतृत्व कर रहे थे.. 11 जुन से पहले तक वो बाबु अमर सिंह के साथ लगातार अंग्रेज़ो से जंग कर रहे थे.. चुंके अमर सिंह बिहार लौटमा चाहते थे इस लिए अमर सिंह के साथ मिल कर इन्होने रुपसागर कैंम्प पर हमला भी किया.. ठीक उसी समय अली करीम के 400 सिपाही ग़ाज़ीपुर मे अंग्रेज़ो से लड़ रहे थे..

कुछ नाम इतिहास को मिले लेकिन वे तमाम नाम इतिहास को ढूढें नहीं मिले जो देश की आन पर मर मिटे। इसीलिए तो मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र कहने को मजबूर हुये :-

न दबाया जेरे जमीं उन्हें
न दिया किसी ने कफन उन्हें
न हुआ नसीब वतन उन्हें
न कहीं निशाने मजार है।

#VeerKunwarSingh
#उलमाए_सादिक़पुर #WahabiMovement

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#Bihar #BiharForBihari #Bihar_For_Bihari
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सर सैयद अली ईमाम का नाम लिए बग़ैर बिहार का वजुद ही अधुरा है… #BiharDiwas

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Sir Syed Ali Imam is the father of modern Bihar 🔖  Md Umar Ashraf
 
11 फ़रवरी 1869 को पटना ज़िला के नियोरा गांव मे नवाब सैयद इमदाद इमाम के घर पैदा हुए सैयद अली ईमाम का घराना काफ़ी इज़्ज़तदार और पढ़ा लिखा था..
 
सर अली इमाम के परदादा, खान बहादुर सैयद इमदाद अली पटना के सबऔर्डीनेट जज के पद से रिटायर हुए। उनके बेटे, खान बहादुर शम्स-उल-उलेमा सैयद वाहिद-उद दीन पहले हिंदुस्तानी थे, जिन्हें ज़िला मेजिसट्रेट बनाया गया था। इनके बुज़ुरगों मे से एक मुग़ल बादशाह औरंगजेब के उस्ताद भी रह चुके थे। अली इमाम के वालिद सैयद इमदाद इमाम असर पटना कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर के साथ एक शायर भी थे।
 
अली इमाम ने इबतदाई तालीम घर पर ही हासिल की और T.K. घोष एकेडमी मे दाख़िला लिया और 1887 मे इंट्रेंस (मैट्रीक) के इम्तेहान (परिक्षा) मे राज्य भर मे टॉप किया, ध्यान रहे उस समय बिहार, बंगाल, और उड़ीसा एक ही राज्य था..
 
आगे की पढ़ाई के लिए पटना कॉलेज मे दाख़िला लिया और कुछ माह बाद सितम्बर 1887 कालेज छोड़ इंग्लैंड चले गये और मिडिल टेंपल में शामिल हो गए। वहां रहते हुए वे अपने भाई हसन ईमाम के साथ दादाभाई नैरोजी के लिये 1890 में इंग्लैंड के आम चुनाव के दौरान सक्रिय रूप से अभियान चलाते रहे।
 
वापस भारत आने से पहले अली ईमाम ने इंगलैंड मे कांग्रेस के ज़रिया भेजे गए नुमाईन्दों के साथ मिल कर अंग्रेज़ो के सामने भारत के हक़ लिए प्रदर्शन किया.. कांग्रेस के इस जत्थे मे जार्ज युल, सुंदरनाथ बेनर्जी और मोरोपंथ जोशी जैसे लोग थे..
 
जुन 1890 मे अली ईमाम वापस भारत लौट आये और नवम्बर 1890 से कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। देखते ही देखते काफ़ी मशहुर हो गए और बड़ी तादाद मे केस उनके पास आने लगा..
 
डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा, सर अब्दुल रहीम (जज मद्रास हाई कोर्ट) और जसटिस शाह दीन (जज पंजाब चीफ़ कोर्ट) अली ईमाम के क़रीबी दोस्तो मे से थे और इन सभी लोगो ने उनकी काफ़ी मदद की..
 
कलकत्ता हाई कोर्ट के स्टैंडिग कौंसिल के पद पर 1908 मे अपनी सेवाएं दी..
 
अप्रील 1908 को पहला बिहार प्रोविंसयल कांफ़्रेंस (बिहार राज्य सम्मेलन) अली इमाम की सदारत (अध्यक्षता) मे पटना मे मुकम्मल हुआ जिसकी पुरी ज़िम्मेदारी सच्चिदानंद सिन्हा और मज़हरुल हक़ के कंधे पर थी.. इसी कांफ़्रेंस मे सर मुहम्मद फ़ख़रुद्दीन ने एक अलग ख़ुदमुख़्तार रियासत “बिहार” की मांग करते हुए रिज़ुलुशन पास किया जिसे हर ज़िले से आए हुए नुमाएंदों ने सपोर्ट किया…
 
1909-10 के बीच डुमराओ राज एडोप्शन केस मे सिविल जल के सामने पैरवी करते हुए उस समय के सबसे क़ाबिल वकील चित्तरंजन दास को बुरी तरह हराया.. और इसी तरह वकालत के पेशे में उन्होंने बेशुमार शोहरत और दौलत कमाया।
 
30 दिसम्बर 1908 को अली इमाम की सदारत (अध्यक्षता) मे मुसलिम लीग का दुसरा सेशन अमृतसर मे मुकम्मल हुआ..
 
डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा अपनी किताब Some Eminent Behar Contemporaries मे लिखते हैं :-
 
1908 मे मुसलिम लीग के सदर के रुप मे अली ईमाम द्वारा दिए गए भाषण की तारीफ़ ना सिर्फ़ हिन्दुस्तान मे हुई बल्के इसकी धुम इंगलैंड मे देखने को मिली… उनकी तक़रीर को राष बिहार घोष की तक़रीर के साथ जोड़ कर देखा गया जो घोष साहेब ने उसी साल कांग्रेस के मद्रास सेशन मे दिया था.. दोनो की तक़रीर पर रिव्यु देते हुए इंगलैंड के उस समय के सबसे मशहुर मैगज़ीन “द क्वाटर्ली रिव्यु” ने अली ईमाम की तक़रीर को कोट करते हुए लिखता है के हिन्दुस्तान के मुसलमान अब जागरुक हो चुके हैं.. अली ईमाम ने अपने तक़रीर की शुरुआत कुछ इस तरह किया था :- हम, हिन्दुस्तान के तालीमयाफ़्ता मुसलमान किसी भी हाल मे अपने बेरादरान ए वतन के मुक़ाबले मादर ए वतन से कम मुहब्बत नही करते हैं..
 
1910 मे मुसलिम लीग के दिल्ली सेशन मे नाएबसदर (उपाअध्यक्ष) भी रहे..
 
1910 मे ही लॉ मेम्बर एस.पी. सिन्हा ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया तब वाईसरॉय लार्ड मिंटो ने डॉ सच्चिदानंद सिन्हा से इस पद के लिए सबसे क़ाबिल शख़्स का नाम पुछा तो उन्होने सर अली ईमाम का नाम आगे कर दिया, पर अली ईमाम ने इस पद पर जाने से इंकार कर दिया लेकिन सच्चिदानंद सिन्हा के बार बार ज़ोर ड़ालने पर वो खुद को रोक नही पाए और लॉ मेम्बर अस.पी. सिन्हा की जगह ले ली.. और इस पद पर उन्होने बेहतरीन काम अंजाम दिया जिसके लिए उन्हे 1908 मे नाईट की उपाधी दी गई और वोह “सर अली ईमाम” हो गए..
 
1911 में वे भारत के गवर्नर जनरल के एग्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्य बने और फिर इसके वाईस प्रेजिडेंट।
 
25 अगसत 1911 को सर अली ईमाम ने हिन्दुस्तान की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का पुरा ख़ाका उस समय भारत का वाईसराय लार्ड हार्डिंग के सामने पेश किया जिसे स्विकारते हुए अंग्रेज़ो ने दसम्बर 12, 1911 को हिन्दुस्तान की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का एलान किया…
 
इसमे अली इमाम की दुरअंदेशी थी, वोह जानते थे अगर हिन्दुस्तान की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली कर दी जाये तो बंगालीयों की एक तरफ़ा दादागिरी मे काफ़ी कमी आएगी और बिहार बंगाल से अलग हो कर एक ख़ुदमुख़्तार रियासत बनेगा।
उस रिपोर्ट को सबमिट करने वाले आठ लोगो की टीम मे अली ईमाम एकलौते हिन्दुस्तानी थे, इसलिए उन्होने उस वक़्त के हकुमत को ये समझाया की बिहार की ज़ुबान, तहज़ीब वग़ैरा बंगाल से बिलकुल जुदा है, इस लिए बिहार को एक अलग रियासत बनाया जाए…. और आख़िरकार 12 दिसम्बर 1911 को अंग्रेज़ी हुकूमत ने बिहार व उड़ीसा के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर इन कौंसिल का एलान कर दिया जिसके नतीजे मे 22 मार्च 1912 को बिहार वजुद मे आया…
 
1911 मे ही उन्हे चैंमपियन (सी.एस.आई) के ख़िताब से नवाज़ा गया..
 
बांकीपुर पटना के एक जलसे मे ख़िताब करते हुए आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपती डॉ राजेंद्र प्रासाद ने सर अली इमाम को बाबा ए जदीद बिहार (फ़ादर ऑफ मॉडर्न बिहार) कह कर ख़िताब किया…
 
1910 से 1913 के बीच वक़्फ़ बिल को पास करवाने मे सबसे बड़ा हांथ सर अली इमाम का ही था..
 
1 जुलाई 1913 को कानपुर के मछली बाज़ार स्थित मसजिद को भारी विरोध के बावजुद अंग्रेज़ अफ़सर HGS Tyler (ज़िला मैजिसट्रेट) और JS Meaton (गवर्नर ऊ.पी.) ने शहीद करवा दिया जिसके विरोध मे कानपुर सहीत पुरे मुल्क भर मे एहतेजाज हुए और इसी कड़ी मे एक एहतेजाजी जलसा 3 अगस्त 1913 को ईदगाह मैदान कानपुर मे हुआ जिसकी क़यादत मौलाना आज़ाद सुब्हानी रब्बानी कर रहे थे… इस जलसे मे तक़रीबन पचास हज़ार लोग शरीक हुए थे जिस पर अंग्रेज़ो ने गोली चलवा दी थी जिससे मौक़ा ए वारदात पर 70 लोग शहीद हो गए थे. दफ़ा 144, 333 ताज़ीरात ए हिन्द के तहत सैकड़ों लोग गिरफ़्तार कर लिए गए.. मौलाना आज़ाद सुब्हानी दफ़ा 124A, 153A के तहत गिरफ़तार किये गए… तब मौलाना मज़हरुल हक़ ने इस केस की पैरवी की और उस समय सर अली ईमाम अपने ओहदे का इस्तमाल कर अंग्रेज़ो पर ये दबाव डाला के वोह तमाम मुक़दमात को वापस लें और लोगों को रिहा करें.. तब उस समय भारत का वाईसराय लार्ड हार्डिंग खु़द सर अली ईमाम के साथ 13-14 अक्तुबर 1913 को मौक़ा ए वारदात का दौरा किया और पुरी जानकारी लेते हुए तमाम केस को वापस ले लिया और लोग रिहा कर दिये गए… और उसने उस जगह वापस मसजिद बनाने की इजाज़त दे दी.. इस पुरे वाक़िये पर नज़र दौड़ेने के बाद कहा जा सकता है के सर अली ईमाम की वजह कर शहीदों का ख़ुन ज़ाया नही गया…
 
1914 मे उन्हे नाईट कमांडर (के.सी.एस.आई) के ख़िताब से नवाज़ा गया..
 
अब उनका क़द काफ़ी बढ़ चुका था और वकालत की दुनिया मे उनका नाम इज़्ज़त से लिया जाने लगा..
 
मौलाना ज़फ़र अली ख़ान अपने समय मे अंग्रेज़ो के चमचो के सबसे बड़े आलोचक माने जाते थे, वोह सर और ख़ान बहादुर के लक़ब को हकारत की नज़र से देखते थे और जब अल्लामा इक़बाल को ‘सर’ के ख़िताब से नवाज़ा गया तो तंज़ करते हुए उनका ये शेर बहुत मशहुर हुआ “सरकार की दहलीज़ पर ‘सर’ हो गए इक़बाल” पर मौलाना का रवैया अली ईमाम के तईं कुछ और निकला जिसे वोह अपनी ज़बान मे कुछ इस तरह बयान करते हैं:-
सरों के ज़िक्र पर एक दोस्त ने सवाल किया
के इस गिरोह मे कुछ.लोग नोक नाम भी हैं.
 
मेरी नज़र मे तो सब सर हैं नफ़्स के महकूम
और इसके साथ ही सरकार के ग़ुलाम भी हैं.
 
दिया जवाब ये मैने के उनको कुछ ना कहो
इस गिरोह मे सैयद अली ईमाम भी हैं..!!
 
वैसे अल्लामा इक़बाल ख़ुद सर अली ईमाम से बहुत ही मुतास्सिर थे और उन्होने अपनी अज़ीम किताब ‘इसरार ए ख़ुदी’ मे उन्नीस अशआर का एक क़सीदा अली ईमाम के हुज़ुर मे पेश किया है, जो बताने को काफ़ी है अल्लामा इक़बाल की नज़र मे अली ईमाम क्या हैसियत रखते थे..
 
सर अली ईमाम 1915 मे लॉ मेम्बर के पद से रिटायर हुए..
 
1915 मे ही मौलाना मज़हरुल हक़ ने मुसलिम लीग के मुम्बई सेशन की सदारत (अध्यक्षता) की और हिन्दु मुसलिम एकता की खुल कर वकालत की.. सर अली ईमाम और मौलाना मज़हरुल हक़ के मेहनत का नतीजा ही था जो कांग्रेस और मुसलिम के बीच 29-31 दिसम्बर 1916 के दौरान लखनऊ समझौता हुआ..
 
3 फ़रवरी 1916 को पटना हाई कोर्ट के क़याम (स्थापना) के बाद सितम्बर 1917 मे सर अली ईमाम को पटना हाई कोर्ट के जज के पद पर बैठा दिया गया, इस पद पर वोह दो साल तक रहे..
 
जब अली ईमाम के मामु सैयद शरफ़ुद्दीन के बिहार और ऊड़ीसा सरकार के एग्जीक्यूटिव कौंसिल के पद से रिटायर हुए तो अली ईमाम ने 1918 मे उनकी जगह लेते हुए एक साल तक अपनी सेवाएं दी और अगस्त 1919 मे निज़ाम हैदरबाद के यहां प्राधानमंत्री का ओहदा संभाला और फिर वहां अपनी सेवाएं दी।
 
दिसम्बर 1920 मे लीग आफ़ नेशन की पहली असेम्बली मे हिन्दुस्तान की नुमाईंदगी नवानगर के महाराजा जाम साहेब साथ मिल कर की..
 
1923 में फिर से पटना हाई कोर्ट वकालत शुरु की और साथ ही हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए खुल कर हिससा लेने लगे.. उन्होने कांग्रेस की कई नीतियों का खुल कर समर्थन किया.. स्वाराज और स्वादेशी की पैरवी की जिस वजह कर उन्हे “स्वादेशी लीग” का सदर बना दिया गया.. और इस पद पर रहते हुए उन्होने लोगो को जागरुक किया..
 
1927 में सर अली ईमाम ने साईमन कमीशन का जम कर विरोध किया..
 
चुंके सर अली ईमाम हिन्दु मुसलिम एेकता के कट्टर समर्थक थे इस लिए उन्होने 1928 मे नेहरु रिपोर्ट पर दस्तख़त कर दिया, पर लिखने वाले लिखते हैं के उन्होने एैसा राजा साहेब महमुदाबाद के कहने पर किया क्युंके वोह उनके समधी थे (राजा साहेब महमुदाबाद के साहेबज़ादी की शादी अली इमाम के साहेबज़ादे से हुई थी). बहरहाल मुद्दा जो भी हो पर सर अली ईमाम ने नेहरु रिपोर्ट के समर्थन मे कई जल्से को ख़िताब किया..
 
अप्रील 1931 को लखनऊ मे अॉल पार्टीज़ नेशनलिस्ट मुसलिम कांफ़्रेंस की सदारत (अध्यक्षता) कर हिन्दुस्तान के मुसलमानो को मुल्क की ख़ातिर लड़ने के लिए प्रेरित किया..
 
1931 मे ही सर अली ईमाम ने राऊंड टेबल कानफ़्रेंस मे हिस्सा लिया..
 
अली ईमाम न तो वे शाहजहां थे और न उनकी बेगम मुमताज़ थीं. पर उनके शौक़ शाहजहां की तरह ही थे. वोह भी ताज महल बनवाना चाहते थे.. जब उनकी तमन्ना ज़मीन पर उतरी तो रांची की सरज़मीन ने वो आलीशान इमारत देखी, जो अपनी स्कॉटिश कैसल स्टायल और खूबसूरती के लिए तब की रांची में चर्चा का विषय बन गई इस इमारत का नाम था “अनीस कैसल” जो ईमाम कोठी के नाम से भी जाना गया… ये और बात थी कि इमाम साहब का ताजमहल संगमरमर से न बनकर लाल ईंटों और सुर्खी चूने से बना था.
 
लेकिन यह कैसल की खूबसूरती थी, जिसने लोगों को इसका मुरीद बन दिया था. लोग तो यहां तक कहते थे कि इमाम साहब ने विला नहीं, बल्कि लाल किला बनवाया है और रांची क्या इस जोड़ की कोई दूसरी इमारत पूरे बिहार में नहीं है. बिहार इसलिए, क्योंकि जब यह इमारत बनी थी तो झारखंड बिहार का हिस्सा था.
 
सर सैयद अली इमाम ने अपनी बेगम अनीस फातिमा के लिए बनवाया था. उनकी चाहत तो यह थी कि मरने के बाद उनकी और उनकी बेगम की कब्र साथ रहे, जिससे वे मरकर भी जुदा न हों. इस लिए उन्होंने अनीस कैसल के पास दो क़ब्रें बनवाई थीं. लेकिन उनकी यह चाहत पूरी न हो सकी.
 
एक कब्र में 27 अक्तुबर 1932 में अली इमाम के इंतकाल के बाद उन्हें दफ़ना दिया गया, पर दूसरी क़ब्र आज तक ख़ाली पड़ी है. अपने आख़री समय में लेडी इमाम पटना आईं और पटना में ही उनका इंतकाल हुआ. इंतकाल के बाद उन्हें पटना में ही दफ़ना दिया गया.
 
अली ईमाम को ख़ूबसूरत इमारतों का शौक़ था। पटना के मौलाना मज़हरुल हक़ पथ (फ़्रेज़र रोड) और एस.पी. वर्मा रोड के मुहाने पर उन्होंने अपने वालिद के ख़्वाहिश पर अली मंज़िल की तामीर करवाई। उनके छोटे भाई सैयद हसन इमाम तब तक डाकबंगला चौराहे पर रिज़वान कैसल बनवा चुके थे।
 
अपनी पहली पत्नी नईमा ख़ातून के इंतक़ाल के बाद 1916 में उन्होंने एक ईसाई महिला रोज़ मैरी से शादी की थी। शादी के बाद रोज़ मैरी, मरियम बनी। अली इमाम ने मरियम के लिए अनीसाबाद में मरियम मंज़िल बनवाया। यह जब तक बन कर तैयार हुआ, मरियम का निधन हो गया। अली इमाम को इस बात का दुःख हमेशा रहा कि इस इमारत के बनने के बाद मरियम ज़्यादा दिनों तक उनके साथ नही रह सकीं।
 
इसके बाद अली इमाम ने तीसरी शादी की। अनीस फातिमा से। जो लेडी अनीस के नाम से मशहुर हुईं.. उनके लिए उन्होंने रांची में एक बेहद खूबसूरत ईमारत बनवाया जो अनीस कैसल के नाम से जाना गया।
 
मरियम मंजिल में मौलाना आज़ाद कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी चलाया जा रहा है। रांची में उन्होंने जो अनीस कैसल बनवाया था, वह संगमरमर के गोदाम के रूप में तब्दील होकर रह गया है।
 
ग़ौर करने वाली बात ये है के हैदराबाद जाने से पहले अली इमाम ने पहाड़पुर मौजे का 95 बीघा हाता अनीसा बेगम के नाम पर कर दिया। उन्होंने पहले से ही एक मकान चितकोहरा पोस्ट ऑफिस के लिए दिया हुआ था। उनके इलतिजा पर इसका नाम अनीसाबाद पोस्ट ऑफिस कर दिया गया। बाद में पूरे 95 बीघा हाता को ही अनीसाबाद के नाम से जाना जाने लगा जहां आज एक बहुत अबादी रह रही है, वहीं बग़ल मे एक पौश कॉलनी है जिसे अली नगर के नाम से जाना जाता है। उन्हे ख़िराज ए अक़ीदत पेश करने के लिए हुकुमत ने चितकोहरा पुल के पास से गुज़रने वाली एक सड़क का नाम अली ईमाम पथ कर दिया है…

शहीद वैज़ुल हक़ भारत का एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसे इतिहास के पन्नो में दफ़न कर दिया गया है…

अगस्त 1942 को गांधी जी की क़ियादत मे जैसे ही युसुफ़ जाफर मेहर अली ने ‘अंग्रेज़ो भारत छोड़ो’ का नारा दिया पुरे हिन्दुस्तान मे इंक़लाब की लहर दौड़ पड़ी और इसका असर मुम्बई जैसे बड़े शहर से निकल कर बिहार के मेदनीपुर बड़हिया जैसे गांव पर भी पड़ा, 9 अगस्त 1942 को इंक़ालाबीयों के हुजुम ने गया ज़िला के कुर्था थाने पर क़ब्ज़ा कर हिन्दुस्तान का परचम लहरा दिया और थाने पर कब्ज़ा देख अंग्रेज़ पुरी तरह बौखला गए और उन्होने गोली चलाने का हुक्म दे दिया जिसके नतीजे मे इंक़ालाबीयों की क़यादत कर रहे मेदनीपुर बड़हिया के लाल ‘मलिक वैज़ुल हक़’ बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए और उनके साथी ‘श्याम बिहारी बेनीपुरी’ जो उस समय 9वीं दर्जे के तालिब ए इल्म थे मुल्क की ख़ातिर मौक़ पर ही शहीद हो गए… वैज़ुल हक़ साहेब को इलाज के लिए हॉस्पीटल ले जाया गया जहां वोह भी वतन ए अज़ीज़ की ख़ातिर कुछ दिन बाद शहीद हो गए…

गया ज़िला (अब अरवल) के कुर्था थाना के अंदर आने वाले मेदनीपुर बड़हिया के नियामत नबी के घर 1913 को पैदा हुए वैज़ुल हक बचपन से ही बहुत बहादुर थे … जब आंख खोला तो चंपारण मे गांधी के ज़ेर कियादत तहरीक चल रही थी, जब थोड़े बड़े हुए तो आंखो के सामने ख़िलाफ़त और असहयोग तहरीक देखा … येह वो दौर था जब बिहार के देहाती इलाक़ो मे इंक़लाबीयों की फ़ौज तैयार हो रही थी, जिसे इलाक़ाई नेता लीड कर रहे थे… इब्तादाई तालीम कुर्था मे ही हासिल की…

बचपन से ही मुल्क की ख़ातिर कुछ करने का जज़्बा अपने सीने मे लिए वैज़ुल हक़ बड़े होने के बाद कांग्रेस से जुड़े और थाना कांग्रेस कमिटी कुर्था के सदर बने और खुल कर अंग्रेज़ मुख़ालिफ़ मुहीम से जुड़ गए … इस वजह कर अंग्रेज़ो के नज़र मे खटकने भी लगे और कई बार गिरफ़्तार भी हुए… फुलवारीशरीफ़, बक्सर और गया के जेल की काल कोठरियां इस बात की गवाह हैं.. चुंके वैज़ुल हक़ साहेब गर्म दल के नेता थे इस लिए अंग्रेज़ो को नुक़सान पहुंचाने और मुल्क से बाहर करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे.. और यही वजह है वोह और उनके इंक़लाबी साथीयों ने गया ज़िला के पंचानपुर पुल को उड़ाने की एक नाकाम कोशिश भी की जिसके लिए उन्हे महीनो गया जेल मे रहना पड़ा..

आज भी वैज़ुल हक़ के आबाई माकान के टुटे हुए दरवाज़े जिसे अंग्रेज़ो ने गड़ांसे से तोड़ा था और दीवार पर गोलीयों के निशानात मौजुद हैं जो अंग्रेज़ो के ज़ुल्म को बयां करने के लिए काफ़ी हैं.. वैज़ुल हक का मकान उस वक़्त इंक़लाबी सरगर्मीयों का मरकज़ हुआ करता था.. बड़ी तादाद मे उनके मकान मे हथियार भी ऱखे रहते थे… एक बार अंग्रेज़ो ने उनके मकान से बंदुक़ और कसीर तादाद कारतुसें भी बरामद की थी…

वैज़ुल हक़ साहेब को नेताजी सुभाष चंद्र सहित कई अज़ीम नेताओं के ख़त आया करते थे, ये ख़त आज भी उनके वारिसों के पास महफ़ुज़ है…

वैज़ुल हक़ प्रो अब्दुल बारी के बहुत ही करीबी लोग मे शुमार होते थे और उनसे अकसर सलाह मशवरा करते थे. ग़ौर कीजिए प्रो अब्दुल बारी को भी गोली मार कर शहीद कर दिया गया था…

आज़ादी के बाद हुकुमत ए हिन्द की जानिब से शहीद वैज़ुल हक़ साहेब की विधवा को मोतिहारी मे कुछ ज़मीन देने की बात की गई, पर एक अकेली महीला के लिए अपने गांव से सैकड़ो कि.मी. दुर ज़मीन लेना बहुत ही मुशकिल भरा फ़ैसला था और उन्होने ये कह कर इंकार कर दिया के उनके पास सौ बिघा ज़मीन है और उन्हे सिर्फ़ एक ही बेटा है… ग़ौर करने वाली बात है शहीद वैज़ुल हक़ साहेब की पत्नी सिर्फ़ 25 साल की उमर मे मुल्क की ख़ातिर विधवा हो गई थीं… पर उन्हे पेनशन मिला जो किसी वजह कर बाद मे बंद कर दिया गया … भारत के रेलवे मिनिसटर की जानिब से भी शहीद वैज़ुल हक़ साहेब के परिवार वाले को कुछ ख़त आए जिसमे उनके मुल्क की ख़ातिर दी हुई क़ुर्बानी को साधुवाद पेश किया गया और उनकी शहादत को हमेशा याद रखने की बात की गई है..

पर कोई बताएगा शहादत को याद कैसे करते हैं ? अमर शहीद श्याम बिहारी बेनीपुरी के सम्मान मे एक मुजस्समा (मुर्ती) भर ही है.. वो भी सिर्फ़ नाम का … क्योंके उनका कोई फ़ोटो नही था इस वजह कर उनके बड़े भाई को ही नज़र मे रख कर मुर्ती तैयार की गई और नाम मे शहीद श्याम बिहारी बेनीपुरी लिख दिया गया … इन लोगो के नाम पर पुरे बिहार तो छोड़िए अपने ही आबाई इलाक़ा कुर्था मे ना ही कोई स्कुल है, ना ही कोई सरकारी एदारा …. यहां तक के एक रोड भी इनके नाम पर नही है… कैसे याद कीजिएगा इनकी क़ुर्बानी को ? आज इन शहीदों को परिवार का कोई पुरसान ए हाल पुछने वाला नही है… शहीद वैज़ुल हक़ साहेब के परिवार वाले तो अपने बुज़ुर्गों की क़ुर्बानी को याद करते हुए कहते हैं जिसने मुल्क के सम्मान के लिए लड़ते हुए अपनी जान को कुर्बान कर दिया उसे अपने ही मुल्क, राज्य, ज़िला और गांव मे सम्मान नही मिल रहा है… और यही शिकायत शहीद श्याम बिहारी बेनीपुरी के परिवार वालो का भी है…

आख़िर मे शहीदों को इक़बाल के इस शेर के साथ ख़िराज ए अक़ीदत ⬇

शहादत है मतलूब-ओ- मक़सूद ए मोमिन
न माल- ए – ग़नीमत न किश्वर कुशाई…

Md Umar Ashraf

प्रोफे़सर अब्दुल बारी भारत का एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसे इतिहास के पन्नो में दफ़न कर दिया गया है…

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Md Umar Ashraf

महान मज़दूर नेता, जंगे आजादी के क़द्दावर नेता और 1937 में बिहार विधान सभा के सदस्य रहे  1940 के दशक मे बिहार के सबसे बड़े कांग्रेसी और मज़दुर लीडर थे.

जिनके बारे मे यहां तक कहा जाता है कि अगर 28 मार्च 1947 को ख़ुसरुपुर (फ़तुहा) के पास उन्हे शहीद नही किया जाता तो आज़ादी के बाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री “प्रोफेसर अब्दुल बारी” ही होते 🙂 ख़ैर इन बातो को जाने दीजिए …

कहने को तो “प्रोफ़ेसर अबदुल बारी” कांग्रेसी भी थे और कामनिस्ट (वामपंथी) भी पर खु़द को स्वातंत्रा सेनानीयों की पार्टी कहने वाली INC ने तो ‘अबदुल बारी’ को बिलकुल भुला ही दिया है और प्रोफ़ेसर अबदुल बारी के बनाए हुए मज़दुर युनियन के नाम पर ख़ुद को मज़दुरों की पार्टी कहने वाली कामनिस्ट पार्टीयों ने भी इन्हे भुला दिया है, हद तो तब हो गई जब हम मज़हब मुसलमानो ने इन्हे पहचाने से इंकार कर दिया. वैसे इनकी समाजिक और सियासी पहुंच का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है के इनके नमाज़े जनाज़ा मे महात्मा गांधी जैसे क़द्दावर लोग शरीक हुए थे 🙂

ये वही शख़स हैं जिनके एक क़ौल पर अक्तुबर 1946 को पुरा पटना शहर लहकने से बच गया जब बिहार का पुरा मगध ज़ोन मुसलिम मुख़ालिफ़ फ़सादात (दंगा) से जुझ रहा था जिसमे सिर्फ़ आठ दिन के अंदर तक़रीबन तीस हज़ार से भी ज़्यादा लोग क़तल कर दिए गए थे…

ये भी इत्तेफ़ाक़ है पटना शहर को बचाने वाला शख़्स ख़ुद पटना ज़िला के ख़ुसरुपुर (फ़तुहा) मे 28 मार्च 1947 को शहीद कर दिया जाता है एक गोरखा सिपाही के द्वारा(कहने वाली बात है) … आज तक इस बात से पर्दा नही उठ सका के उनके क़तल की असल वजह क्या है ? और ज़िम्मेदार कौन है ?

अब्दुल बारी की शहादत के बाद बिहार में फिर दंगा भड़का, तो गांधीजी ने जवाहर लाल नेहरु को बिहार भेजा और अनुग्रह नारायण सिंह के साथ जवाहर लाल नेहरु तीन दिनों तक पैदल सड़कों पर घूम कर लोगों से शांति बनाये रखने की अपील करते रहे…

वैसे प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी को ख़िराज ए अक़ीदत पेश करने के लिए कुछ इदारे , मैदान और सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है ⤵

➡ अब्दुल बारी मिमोरियल कालेज गोलमुरी जमशेदपुर
➡ अब्दुल बारी टाऊन हाल जहानाबाद
➡ बारी मैदान साक्ची जमशेदपुर
➡ प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी टेकनिकल सेंटर पटना
➡ प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी पथ पटना
➡ प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी मिमोरियल हाई स्कुल, नोआमुंडी माईन सिंहभुम झारखंड
➡ बारी मैदान ब्रनपुर आसंसोल

➡ उन्नीसवीं सदी मे बना कोईलवर का पुल इक्कीसवीं सदी में भी गर्व से अपनी सेवाएं आज भी दे रहा है जिसका असल नाम प्रोफेसर अब्दुल बारी के नाम पर रखा गया है और वो अब्दुल बारी पुल है। पर इस नाम से इसे कोई जानता नही है… पटना से आरा की तरफ़ जाने पर कोईलवर रेलवे स्टेशन के ठीक बाद यह पुल शुरू हो जाता है। एक ज़माने मे इस पुल को देश का सबसे बड़ा रेलवे पुल होने का भी श्रेय प्राप्त था। ये सोन नदी पर बना आखिरी पुल भी है। इसके बाद सोन नदी गंगा में मिल जाती है।

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हमें भी याद रखें जब लिखें तारीख़ गुलशन की,
के हमने भी जलाया है चमन में आशयां अपना.
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इस वजह कर बार बार कहता हुं के अपने बुज़ुर्गों को याद करें, तवारिख़ (इतिहास ) के नायकों कि मेहनत और योगदान को भुला देना या नज़रअंदाज कर देना भविष्य के लिए घातक है । अपने अपने क्षेत्रों के बुजुर्गों, स्वतत्रंता सेनानी, लेखक , शिक्षाविदयों के बारे मे लिखें क्योंकि ”जो कौम अपनी तवारीख भूलती है, उसे दुनिया भुला देती है.”

⤴ कौन थे  प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी ⤵

▶ प्रोफे़सर अब्दुल बारी 1892 को बिहार के ज़िला भोजपुर के गांव शाहबाद मे पैदा हुए..

▶ वालिद का नाम मोहम्मद क़ुरबान अली था.

▶ पटना कालेज और जामिया पटना (युनिवर्सटी) से आर्टस में मास्टर डिग्री की हासिल की

▶ 1917 मे माहत्मा गांधी के साथ इनकी पहली मुलाक़ात हुई जब मौलामा मज़हरुल हक़ गांधी की मेज़बानी पटना मे कर रहे थे.

▶ 1921 ई. -1922 ई. -1942 ई. मे इन्होने तहरीक ए आज़ादी की जद्दोजेहद के लिए बिहार – उड़ीसा – बंगाल के मज़दुरों को मत्ताहिद किया और उन्हे एक बैनर तले लाने मे अहम किरदार निभाया

▶ 1920-22 मे हुए ख़िलाफ़त और असहयोग तहरीक (आंदोलन) के समय राजेंद्र प्रासाद, अनुग्रहण नारायण सिंह, श्रीकृष्ण सिंह के साथ कंधे से कंधे मिला कर पुरे बिहार मे इंक़लाब बपा किया.

▶ 1921 मे मौलामा मज़हरुल हक़ की मेहनत और पैसे की वजह कर बिहार विद्यापीठ का उद्घाटन 6 फरवरी 1921 को मौलाना मुहम्मद अली जौहर और कस्तूरबा गांधी के साथ पटना पहुंचे महात्मा गांधी ने किया था. मौलाना मज़हरूल हक़ इस विद्यापीठ के पहले चांसलर नियुक्त हुए और इसी इदारे मे अब्दुल बारी प्रोफे़सर की हैसियत से मुंतख़िब हुए. वहीं ब्रजकिशोर प्रसाद वाईस-चांसलर और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद प्रधानाचार्य बनाए गए..

▶ 1930 मे अब्दुल बारी ने भागलपुर मे सत्याग्रह अंदोलन छेड़ा जिसमे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उनके साथ थे.

▶ 1936 के सुबाई इंतख़ाब मे बिहार विधान सभा के सदस्य के रुप मे मुंतख़िब हुए..

▶ 1937 में राज्य चुनाव में 152 के सदन में 40 सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित थीं जिनमें 20 सीटों पर ‘मुस्लिम इंडीपेंडेंट पार्टी’ और पांच सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की.

▶ शुरू में कांग्रेस पार्टी ने मंत्रिमंडल के गठन से यानी सरकार बनाने से इंकार कर दिया तो राज्यपाल ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में बैरिस्टर मो. यूनुस को प्रधानमंत्री (प्रीमियर) पद का शपथ दिलाया.

▶ लेकिन चार महीने बाद जब कांग्रेस मंत्रिमंडल के गठन पर सहमत हो गई तो यूनुस ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

▶ 1937 में बिहार मे पहली बार कांग्रेसी की हुकुमत वजुद मे आई, और अब्दुल बारी चंपारण से जीत कर असेंबली पहुंचे थे और उन्हे इस हकुमत मे असंबली का उपसभापती बनाया गया.

▶ डॉ राजेंद्र प्रासाद के सदारत मे बनी बिहार लेबर इंकोआईरी कमीटी के नाएब सदर मुंतख़िब हुए..

▶ और इसी लेबर इंकौईरी कमीटी के साथ जमशेदपुर मज़दुरो के हाल चाल लेने पहुंचे.

▶ नेता जी सुभाष चंद्र बोस जो उस वक़्त जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन के सदर थे की दरख़्वास्त पर जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन की क़ियादत करने का फ़ैसला किया..

▶ अब्दुल बारी ने लेबर एसोसिएशन का भारतीय कानून के तहत मजदूर यूनियन के रूप में परिवर्तित किया।

▶ इसके बाद बिहार बंगाल उड़ीसा मे मज़दुर आंदोलन को एक नई पहचान दी और पुरे इलाक़े मे इंक़लाब ला दिया…

▶ टिस्को में मजदूरों के संगठन का नाम लेबर एसोसिएशन था। ट्रेड यूनियन एक्ट बनने के बाद अब्दुल बारी के कार्यकाल में इसका नामकरण टाटा वर्कर्स यूनियन किया गया था। पांच मजदूरों पर गोली चालन के बाद 1920 में लेबर एसोसिएशन बना था।

▶ टिस्को(टाटा स्टील) की तारीख़ मे पहला समझौता 1937 मे अब्दुल बारी की ही क़यादत मे हुआ.

▶ 1937 से 1947 तक अब्दुल बारी टिस्को (टाटा स्टील) वर्कर्स युनियन के सदर के तौर पर रहे..

▶ 1942 के भारत छोड़ो तहरीक से जुड़े और ख़ुद को साबित किया.

▶ 1946 में बिहार प्रादेश कमिटी के सदर मुंतख़िब हुए..

▶ 28 मार्च 1947 को ख़ुसरुपुर (फ़तुहा) के पास उन्हे शहीद कर दिया गया.

DPA-MKG-33164 - © - Vithalbhai Jhaveri/Dinodia Photo
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Mahatma Gandhi at the funeral of Professor Maulana Abdul Bari in Patna, Bihar, India, 29 March 1947.

▶ महात्मा गांधी ने प्रोफे़सर अब्दुल बारी के शहादत पर संवेदना करते हुए 29 मार्च 1947 को कुछ बात लिखी थी जिसे बिहार विभुती किताब मे अभीलेखार भवन द्वारा शाए किया गया ” जिसमे गांधी ने उन्हे अपनी आख़री उम्मीद बताया ” और कहा के अब्दुल बारी एक ईमांदार इंसान थे पर साथ मे बहुत ही ज़िद्दी भी थे…

▶ वहीं पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने प्रोफे़सर अब्दुल बारी की पहली बर्सी के मौक़े पर इनके कारनामे को याद करते हुए एक पैग़ाम 22 मार्च 1948 को लिखा जिसे मज़दुर आवाज़ मे शाए (छापा) किया गया.

#AbdulBari

ﭘﺮﻭﻓﯿﺴﺮ ﻋﺒﺪ ﺍﻟﺒﺎﺭﯼ ﺍﯾﮏ ﺑﮭﺎﺭﺗﯽ ﺗﻌﻠﯿﻤﯽ ﺍﻭﺭ ﺳﻤﺎﺟﯽ ﻣﺼﻠﺢ ﺗﮭﮯ . ﺍﻥ ﮐﯽ ﭘﯿﺪﺍﺋﺶ ﺑﮩﺎﺭ ﮐﮯ ﮔﺎﺅﮞ ﺷﺎﮦ ﺁﺑﺎﺩ ﺿﻠﻊ ﺟﮩﺎﮞ ﺁﺑﺎﺩ ﻣﯿﮟ 1892 ﺀ ﻣﯿﮟ ﮨﻮﺋﯽ۔

ﺍﻧﮩﻮﮞ ﻧﮯ 1918 ﺀ ﻣﯿﮟ ﮔﺮﯾﺠﯿﻮﺷﻦ ﮐﯽ ﺗﻌﻠﯿﻢ ﮐﮯ ﺑﻌﺪ، ﺗﺎﺭﯾﺦ ﻣﯿﮟ 1920 ﺀ ﻣﯿﮟ ﻣﺎﺳﭩﺮﺯ ﮐﯽ ﺗﻌﻠﯿﻢ ﺟﺎﻣﻌﮧ ﭘﭩﻨﮧ ﺳﮯ ﺣﺎﺻﻞ ﮐﯽ . ﺍﻧﮩﻮﮞ ﻧﮯ ﺑﮩﺎﺭ ﮐﮯ ﻧﯿﺸﻨﻞ ﮐﺎﻟﺞ، ﺟﻮ ﺍﺱ ﻭﻗﺖ ﻣﮩﺎﺗﻤﺎ ﮔﺎﻧﺪﮬﯽ ﮐﯽ ﺳﻮﺩﯾﺸﯽ ﺗﺤﺮﯾﮏ ﮐﮯ ﺗﺤﺖ ﺷﺮﻭﻉ ﮐﯿﺎ ﮔﯿﺎ ﺗﮭﺎ، 1921 ﺀ ﻣﯿﮟ ﭘﺮﻭﻓﯿﺴﺮ ﮐﮯ ﻃﻮﺭ ﭘﺮ ﺷﻤﻮﻟﯿﺖ ﺍﺧﺘﯿﺎﺭ ﮐﯽ .

ﺯﻧﺪﮔﯽ ﮐﮯ ﺑﮩﺖ ﺷﺮﻭﻉ ﺳﮯ ﮨﯽ ﺍﻥ ﮐﮯ ﺩﻣﺎﻍ ﻣﯿﮟ ﺗﻌﻠﯿﻤﯽ ﺑﯿﺪﺍﺭﯼ ﮐﮯ ﺫﺭﯾﻌﮧ ﺑﮭﺎﺭﺗﯽ ﻣﻌﺎﺷﺮﮮ ﻣﯿﮟ ﺳﻤﺎﺟﯽ ﺍﺻﻼﺣﺎﺕ ﻻﻧﮯ، ﺳﻤﺎﺟﯽ ﻋﺪﻡ ﻣﺴﺎﻭﺍﺕ، ﻧﺴﻠﯽ ﺧﻠﻞ ﺩﻭﺭ ﮐﺮﻧﮯ ﮐﺎ ﺧﯿﺎﻝ ﺗﮭﺎ . ‏ ﺍﻧﮩﻮﮞ ﻧﮯ ﻏﻼﻣﯽ ﺳﮯ ﺁﺯﺍﺩ ﺑﮭﺎﺭﺕ ﮐﺎ ﺍﯾﮏ ﺧﻮﺍﺏ ﺩﯾﮑﮭﺎ ﺗﮭﺎ .

ﺟﺲ ﮐﮯ ﻧﺘﯿﺠﮯ ﻣﯿﮟ ﻭﮦ ﺑﮭﺎﺭﺕ ﻣﯿﮟ ﻣﺰﺩﻭﺭ ﯾﻮﻧﯿﻦ ﮐﮯ ﺑﺎﻧﯽ ﺑﻨﮯ۔ ‏ ﺍﻧﮩﻮﮞ ﻧﮯ ﺗﺤﺮﯾﮏ ﺁﺯﺍﺩﯼ ﻣﯿﮟ ﺣﺼﮧ ﻟﯿﺎ ﺍﻭﺭ ﺁﺧﺮ ﻣﯿﮟ ﻣﻠﮏ ﮐﯽ ﺭﺍﮦ ﻣﯿﮟ ﺍﭘﻨﯽ ﺟﺎﻥ ﻗﺮﺑﺎﻥ ﮐﯽ۔ﺍﻧﮩﻮﮞ ﻧﮯ ﺑﮩﺖ ﺳﮯ ﺁﺯﺍﺩﯼ ﮐﯽ ﺗﺤﺎﺭﯾﮏ ﻣﯿﮟ ﮈﺍﮐﭩﺮ ﺭﺍﺟﻨﺪﺭ ﭘﺮﺳﺎﺩ ﮐﮯ ﺳﺎﺗﮫ ﺣﺼﮧ ﻟﯿﺎ ﺗﮭﺎ۔

ﭘﺮﻭﻓﯿﺴﺮ ﻋﺒﺪ ﺍﻟﺒﺎﺭﯼ ﮐﯽ ﭘﮩﻠﯽ ﺑﺮﺳﯽ ﮐﮯ ﻣﻮﻗﻊ ﭘﺮ ﮈﺍﮐﭩﺮ ﺭﺍﺟﻨﺪﺭ ﭘﺮﺳﺎﺩ ﻧﮯ ﺍﻧﮑﯽ ﮐﺎﻭﯾﺸﻮﮞ ﮐﻮ ﯾﺎﺩ ﮐﺮﺗﮯ ﮨﻮﮮ ﺍﯾﮏ ﭘﯿﻐﺎﻡ 22 ﻣﺎﺭﭺ ، 1948 ﺀ ﮐﻮ ﻟﮑﮭﺎ ﺟﻮ ﻣﺰﺩﻭﺭ ﺁﻭﺍﺯ ﻣﯿﮟ ﺷﺎﺋﻊ ﮨﻮﺍ۔

* 1892 ﺀ ﻣﯿﮟ ﺑﮩﺎﺭ ﮐﮯ ﺿﻠﻊ ﺑﮭﻮﺟﭙﻮﺭ ﮐﮯ ﮔﺎﺅﮞ ﺷﺎﮦ ﺁﺑﺎﺩ ﻣﯿﮟ ﭘﯿﺪﺍﺋﺶ

* ﻭﺍﻟﺪ ﮐﺎ ﻧﺎﻡ ﻣﺤﻤﺪ ﻗﺮﺑﺎﻥ ﻋﻠﯽ

* ﭘﭩﻨﮧ ﮐﺎﻟﺞ، ﺟﺎﻣﻌﮧ ﭘﭩﻨﮧ ﺳﮯ ﻣﺎﺳﭩﺮ ﺁﻑ ﺁﺭﭨﺲ ﮐﯽ ﺳﻨﺪ

* 1917 ﺀ ﻣﯿﮟ ﻣﮩﺎﺗﻤﺎ ﮔﺎﻧﺪﮬﯽ ﺳﮯ ﺍﻧﮑﯽ ﺑﮩﺎﺭ ﺩﻭﺭﮮ ﮐﯽ ﺩﻭﺭﺍﻥ ﭘﮩﻠﯽ ﻣﻼﻗﺎﺕ

* 1921 ﺀ ، 1922 ﺀ ﺍﻭﺭ 1942 ﺀ ﮐﮯ ﺗﺤﺎﺭﯾﮏ ﺁﺯﺍﺩﯼ ﮐﯽ ﺟﺪﻭﺟﮩﺪ ﻣﯿﮟ، ﺑﮩﺎﺭ، ﺍﮌﯾﺴﮧ ﺍﻭﺭ ﺑﻨﮕﺎﻝ ﮐﮯ ﻣﺰﺩﻭﺭﻭﮞ ﮐﻮ ﻣﺘﺤﺪ ﮐﺮﻧﮯ ﻣﯿﮟ ﻓﻌﺎﻝ ﮐﺮﺩﺍﺭ ﺍﺩﺍ ﮐﯿﺎ

* 1922 ﺀ ﮐﮯ ﻋﺪﻡ ﺗﻌﺎﻭﻥ ﺗﺤﺮﯾﮏ ﻣﯿﮟ ﮈﺍﮐﭩﺮ ﺭﺍﺟﻨﺪﺭ ﭘﺮﺳﺎﺩ ﮐﯽ ﺳﺎﺗﮫ ﺷﻤﻮﻟﯿﺖ

* 1921 ﺀ ﻣﯿﮟ ﺻﺪﺍﻗﺖ ﺁﺷﺮﻡ ﻣﯿﮟ ﻗﻮﻣﯽ ﺳﻄﺢ ﮐﮯ ﮐﺎﻟﺞ ﮐﺎ ﻗﯿﺎﻡ ﻋﻤﻞ ﻣﯿﮟ ﺁﯾﺎ، ﺟﺲ ﮐﮯ ﮈﺍﮐﭩﺮ ﺭﺍﺟﻨﺪﺭ ﭘﺮﺳﺎﺩ ﭘﺮﺳﻨﭙﻞ ﺍﻭﺭ ﻋﺒﺪ ﺍﻟﺒﺎﺭﯼ ﭘﺮﻭﻓﯿﺴﺮ ﺑﻨﮯ

* 1936 ﺀ ﮐﮯ ﺻﻮﺑﺎﺋﯽ ﺍﻧﺘﺨﺎﺑﺎﺕ ﻣﯿﮟ ﺁﭖ ﺑﮩﺎﺭ ﮐﮯ ﺍﯾﮏ ﺭﮐﻦ ﺍﺳﻤﺒﻠﯽ ﮐﮯ ﻃﻮﺭ ﭘﺮ ﻣﻨﺘﺨﺐ ﮐﯿﮯ ﮔﯿﮯ

* 1937 ﺀ ﻣﯿﮟ ﺑﮩﺎﺭ ﮐﯽ ﭘﮩﻠﯽ ﮐﺎﻧﮕﺮﯾﺲ ﺣﮑﻮﻣﺖ، ﺍﻭﺭ ﺁﭖ ﺑﮩﺎﺭ ﺍﺳﻤﺒﻠﯽ ﮐﮯ ﻧﺎﺋﺐ ﺍﺳﭙﯿﮑﺮ ﺑﻨﮯ
ﮈﺍﮐﭩﺮ ﺭﺍﺟﻨﺪﺭ ﭘﺮﺳﺎﺩ ﮐﯽ ﺻﺪﺍﺭﺕ ﻣﯿﮟ ﺑﻨﯽ ﺑﮩﺎﺭ ﻟﯿﺒﺮ ﺍﻧﮑﯿﻮﺍﺋﺮﯼ ﮐﻤﯿﭩﯽ ﮐﮯ ﻧﺎﺋﺐ ﺻﺪﺭ ﻣﻨﺘﺨﺐ
ﻧﯿﺘﺎﺟﯽ ﺷﺒﮭﺎﺱ ﭼﻨﺪﺭ ﺑﻮﺱ، ﺟﻮ ﺍﺱ ﻭﻗﺖ ﺟﻤﺸﯿﺪ ﭘﻮﺭ ﻟﯿﺒﺮ ﺍﺳﻮﺳﯿﺌﺸﻦ ﮐﮯ ﺻﺪﺭ ﺗﮭﮯ، ﮐﯽ ﺩﺭﺧﻮﺍﺳﺖ ﭘﺮ ﺟﻤﺸﯿﺪ ﭘﻮﺭ ﻟﯿﺒﺮ ﺍﺳﻮﺳﯿﺌﺸﻦ ﮐﯽ ﻗﯿﺎﺩﺕ ﮐﺮﻧﮯ ﮐﺎ ﻓﯿﺼﻠﮧ ﮐﯿﺎ

* ﭨﺴﮑﻮ ‏( ﺍﺏ ﭨﺎﭨﺎ ﺳﭩﯿﻞ ‏) ﮐﮯ ﺍﻧﺘﻈﺎﻡ ﮐﮯ ﺳﺎﺗﮫ 1937 ﺀ ﻣﯿﮟ ﭘﮩﻠﯽ ﺗﺎﺭﯾﺨﯽ ﻣﻌﺎﮨﺪﮦ۔

* 1942 ﺀ ﮐﮯ ﺑﮭﺎﺭﺕ ﭼﮭﻮﮌﻭ ﺗﺤﺮﯾﮏ ﻣﯿﮟ ﺷﻤﻮﻟﯿﺖ

* 1946 ﺀ ﻣﯿﮟ ﺑﮩﺎﺭ ﭘﺮﺩﯾﺶ ﮐﺎﻧﮕﺮﯾﺲ ﮐﻤﯿﭩﯽ ﮐﮯ ﺻﺪﺭ ﻣﻨﺘﺨﺐ

* 1947 ﺀ ﭘﭩﻨﮧ ﻣﯿﮟ ﻓﺴﺎﺩ ﭘﮭﯿﻼ
ﮔﺎﻧﺪﮬﯽ ﺟﯽ ﮐﮯ ﺁﺋﻤﮧ ﭘﺮ ﺟﻤﺸﯿﺪ ﭘﻮﺭ ﺳﮯ ﭘﭩﻨﮧ ﮐﮯ ﻟﺌﮯ ﺭﻭﺍﻧﮧ

* 28 ﻣﺎﺭﭺ 1947 ﺀ ﻓﺘﻮﺣﮧ ﺭﯾﻠﻮﮮ ﮐﺮﺍﺳﻨﮓ ﮐﮯ ﻧﺰﺩﯾﮏ ﮔﻮﻟﯽ ﻣﺎﺭ ﮐﺮ ﻗﺘﻞ ﮐﺮ ﺩﺋﮯ ﮔﮯ
ﭘﯿﺮﻣﻮﮨﻨﯽ ﻗﺒﺮﺳﺘﺎﻥ، ﭘﭩﻨﮧ ﻣﯿﮟ ﻣﺪﻓﻮﻥ

* 1936 ﺀ ﺗﺎ 1947 ﭨﺎﭨﺎ ﻭﺭﮐﺲ ﯾﻮﻧﯿﻦ ﮐﮯ ﺻﺪﺭ ﺭﮨﮯ

Abdul Bari was an Indian academic and social reformer. He was born in 1892 in Sahabad, Village Kansua of Jahanabad District in Bihar. He graduated in 1918 and later engaged in post-graduate studies in History in 1920 at Patna University. He joined Bihar National College, which was then started under Mahatma Gandhi ‘s inspiration, as Professor in 1921.

From the very beginning of the life an idea was developing in his mind to bring about social reform in Indian society by awakening the people through propagation of education and teaching as well.

He had a vision of India free from slavery, Social Inequality, communal disharmony. He took part in freedom movement and finally sacrificed his life for the cause of nation. He had taken part in many freedom movements along with Dr. Rajendra Prasad , Shri Babu & Anugraha Babu.

Bari was born in 1892 at Bhojpur (Sahabad), Bihar. His father was Md Qurban Ali. He lived in the village Koilwar, on the banks of river Sone in the locality called Pathantoli He received his M.A. from Patna College, Patna University. A national level college has been established in Sadaqat Ashram, Patna in 1921 in which Dr. Rajendra Prasad was Principal and Abdul Bari was Professor along with Dr Anugrah Narayan Sinha.

His first meeting with Mahatma Gandhi was as a congress worker in 1917 during his visit to Bihar. He played active role to unite worker section of Bihar, Bengal and Orissa for freedom struggle movement in 1921, 1922 and 1942. He also played active role in Non-Cooperation Movement in 1922 with Dr. Rajendra Prasad, Dr Anugrah Narayan Sinha and Dr Sri Krishna Singh.

In the provincial election in 1937, he was elected as an MLA of Bihar from Champaran area on Congress ticket. It was the same election when his relative Barrister Mohammad Yunus was leading second largest party of Bihar- Muslim Independent Party.

He became Dy. Speaker of Bihar Assembly in July, 1937 of first Congress Government which formed on 19 July 1937 after the fall of 4 months long First democratic government of Bihar headed by First Premier(Prime Minister) of Bihar province Barrister Mohammad Yunus He became Vice Chairman of Bihar Labour Enquiry Committee under Chairmanship of Dr. Rajendra Prasad.

The Bihar Labour Enquiry Committee visited Jamshedpur to see the labour problem in Jamshedpur. On the request of Netaji Subhas, then President of Jamshedpur Labour Association, he decided to lead the labour association in Jamshedpur. On the advice of Netaji Subhash Bose he decided to change the name of Jamshedpur Labour Association to Tata Worker’s Union in 1937. He was President of Tata Worker’s Union from 1936–1947.

In 1937 his first historical agreement with TISCO (now Tata Steel ) Management.

Played active role in the Quit India Movement in 1942. In 1946 he became President of Bihar Pradesh Congress Committee. In 1947 riot spread in Patna.

On request of Mahatma Gandhi he was coming to Patna by car from Jamshedpur, he was shot dead near Fatuah Railway Crossing on 28 March 1947.

His killer never got punished because it is said that he was being killed by fellow congressmen in Power struggle for BPCC President and Chief Ministerial Candidate. He is buried in Peermohani Qabristan.

After Prof. Abdul Bari’s gruesome murder Gandhi ji visited his native place ‘Koelwar’ and met the bereaved family.

Gandhi ji was visibly moved at the pathetic sight of abject poverty of this great freedom fighter’s family. There was no money with the family even for Prof. Abdul Bari’s burial.

Professor Abdul Bari’s life is a saga of sacrifice for the freedom of the Motherland.

On the first death anniversary of Prof. Abdul Bari, Dr. Rajendra Prasad recalled his contribution to the nation through a message dated 22 March 1948 published in Mazdur Avaz.

Born on 1892 in Sahabad of Bihar under Bhoj pur District

1919-Completed Education (M.A.) from Patna College

1921-Worked as a professor in National University patna where Dr,Rajendra Prasad was the Principal

1922- He Participated active part in Asarhayjog Andolan under the leadership of Mahatma Gandhi

1930-He was associated in satyagraha movement in Bhagalpur where Dr.Rajendra Prasad was present

1932- Abolished theMetal workers union (Associated with Mr.V.V.Giri later become President Of India) and Jamshedpur Labour foundation (associated with Manik-Homi ) and began the Era of Tata Workers Union under the leadership Prof Abdul Bari

1936- Elecated as a M.L.A

1936-He was elected as President of AICC in Bihar(saran) Regional Congress Meeting
1936-When the Congress Ministry was formed in Bihar Mr.Ram Dayalu Singh from Muzzafarpur elected Speaker and Prof Abdul Bari was elected Deputy Speaker

1938-Elected as President, Prof Bari renamed Jamshedpur labour Associationas as for Tata Workers Union,Jamshedpur

1942-He took active part in Quit India Movement

1946-Last agreement with Tata Steel Management,

The salient feature of agreement are-

Every employee will get one Anna every day with his/her Basic grade 0f Rs.140/- as
Long the new grade agreement will not done

Implement of Incentive Bonus Facilities of treatment in Hospital, Housing facilities to be increased
Education facilities

28 th August1947- He was shot dead at Khusropur near Futuha Rail Way Station.

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Abdul_Bari_(professor)

http://www.tataworkersunion.org/History_of_Past_Presidents/Prof_Abdul_Bari.htm

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अंग्रेज़ों ने जंगे आज़ादी में अपना सबसे बड़ा दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह फ़ैज़ाबादी को माना था.

मतलबपरस्ती की इस दुनिया में किसी भी जननायक को भुला देने के लिए 158 साल कम नहीं होते। जब हमारे ही लोग उस गौरवशाली विरासत की शानदार धरोहर को सहेज कर न रख पा रहे हों तो सत्ता को कोसने का क्या मतलब…?

दरअसल, इतिहास की भी दो किस्में हैं: एक तो राजा, रजवाड़े, रियासतों, तालुकेदारों, नवाबों, बादशाहों, शहंशाहों का और दूसरा जनता का। सत्ता का चरित्र होता है कि वह अपने फ़रेब, साजिशों और दमन के सहारे हमें बार-बार आभास कराती है कि जनता बुजदिल, कायर होती है और जनता के बलिदानों का कोई इतिहास नहीं है। हमारे लोग भी जाने-अनजाने ऐसी साजिशों का हिस्सा बन जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर हम सब कुछ भूलने पर ही उतारू हो जाएं. तो भला याद क्या और किसे रखेंगे ?

एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसे इतिहास के पन्नो में दफ्न कर दिया गया- 

1857 में जब पूरा हिंदुस्तान अंग्रेजों के जुल्मों सितम से परेशान था और बगावत के सिवा उनके पास कोई चारा नही बचा था इसी वक़्त में एक ऐसा शख्श भी था जिसने अंग्रेजों के नाक में दम कर रखा था , दम भी इतना की अंग्रेजों ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ के लाने वाले को 50000 इनाम के तौर पर देने का ऐलान कर दिया। फिर भी अंग्रेजी हुकुमत उन्हें कभी जिन्दा नही पकड़ पाई ।

पहली जंग-ए-आज़ादी के सबसे काबिल पैरोकार एक सूफी-फ़कीर थे। जब आज़ादी की कहीं चर्चा भी नहीं थी उस वक्त फिरंगियों की बर्बरता के विरुद्ध उन्होंने पर्चे लिखे, रिसाले निकाले और देश में घूम-घूम कर अपने तरीके से लोगों को संगठित किया। वे मौलवी हाफिज अहमद उल्लाह शाह, सिकंदर शाह, नक्कार शाह, डंका शाह आदि नामो से मशहूर थे। जैसे उनके कई नाम थे ठीक वैसे ही उनकी शख़्सियत के कई आयाम भी थे।

1857 की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि अंग्रेजों की ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति को धता बता कर हिन्दू-मुसलमान कदम से कदम मिलाकर साथ-साथ लड़े थे। हर मोर्चे पर हालात यह थे कि इंच-इंच भर जमीन अंग्रेजों को गवानी पड़ी या देशवासियों के लाशों के ऊपर से गुज़रना पड़ा। सवाल उठता है कि फिर हम हार क्यों गए? वजह साफ़ है कि ऐसे नाज़ुक दौर में हवा का रुख देखकर आज़ादी में शामिल हुए नायक ‘खलनायक’ बन गए और ऐन मौके पर अपनी गद्दारी की कीमत वसूलने दुश्मनों से जा मिले। इसी विश्वासघात की वज़ह से जंगे आज़ादी के सबसे बहादुर सिपहसालार मौलवी को शहादत देनी पड़ी। 1857 का सबसे बड़ा सबक यह है कि ‘आप बिकेंगे तो हर मोर्चे पर हारेंगे।’

मौलवी को कलम और तलवार में महारत हासिल होने के साथ ही आम जनता के बीच बेहद लोकप्रियता प्राप्त थी। इस योद्धा ने 1857 की शौर्य गाथा की ऐसी इबारत लिखी जिसको आज तक कोई छू भी नहीं पाया। पूरे अवध में नवंबर 185 6 से घूम-घूम कर इस विद्रोही ने आज़ादी की मशाल को जलाए रखा जिसकी वजह से फरवरी 1857 में उनके सशस्त्र जमावड़े की बढ़ती ताकत को देखकर फिरंगियों ने कई लालच दिए, अपने लोगों से हथियार डलवा देने के लिए कहा तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया। इस गुस्ताखी में फिरंगी आकाओं ने उनकी गिरफ्तारी का फ़रमान जारी कर दिया। मौलवी की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अवध की पुलिस को मौलवी को गिरफ्तार करने से मना कर दिया गया। 19 फरवरी 1857 को अंग्रेज़ी फौजों और मौलवी में कड़ी टक्कर के बाद उन्हें पकड़ लिया गया। बागियों का मनोबल तोड़ने के लिए घायल मौलवी को सिर से पांव तक जंजीरों में बांधकर पूरे फैज़ाबाद शहर में घुमाया ही नहीं गया बल्कि फांसी की सजा सुनाकर फैज़ाबाद जेल में डाल दिया गया।

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क्रांति का पौधा जो उन्होंने रोपा था उसका असर यह हुआ कि 8 जून 1857 को सूबेदार दिलीप सिंह के नेतृत्व में बंगाल रेजिमेंट में बगावत का झंडा फहरा कर फैज़ाबाद की बहादुर जनता ने भी बग़ावत कर दी। हज़ारों हज़ार बागियों ने फैज़ाबाद जेल का फाटक तोड़कर अपने प्रिय मौलवी और साथियों को आज़ाद कराय। पूरे फैज़ाबाद से अंग्रेज़ डरकर भाग खड़े हुए। फैज़ाबाद आज़ाद हो गया।

मौलवी की रिहाई का जश्न मनाया गया और उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गयी। फिर तो मौलवी ने सिर्फ फैज़ाबाद तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा बल्कि पूरे अवध-आगरा में जमकर अपनी युद्धनीति का करिश्मा दिखाया। फ़रारी के दिनों में मौलवी को सुनने कई हजार की भीड़ जमा हो जाती थी। प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत में अंगरेज़ी राज़’ के लेखक पंडित सुन्दरलाल लिखते हैं कि ‘वास्तव में बगावत की उतनी तैयारी कहीं भी नहीं थी जितनी अवध में। हजारों मौलवी और हजारों पंडित एक-एक बैरक और एक-एक गांवं में स्वाधीनता युद्ध के लिए लोगों को तैयार करते फिरते थे।’ इतिहासकार होम्स ने उत्तर भारत में अंग्रेजों का सबसे जबदस्त दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह को बताया है।

फ़ैजाबाद के ताल्लुकदार घर में पैदा हुए मौलाना अहमदुल्लाह शाह हैदराबाद से पढाई पूरी करके बहुत कम उम्र में ही लेखक और धार्मिक उपदेशक बन गए। अंग्रेजों के हाथों अवध को आज़ाद करने के लिए उन्हें लोगों को अंग्रेजों के खि़लाफ भड़काने के लिए अपहरण कर लिया गया जिससे आहत होकर मौलाना साहब ने देश पर अपना सब कुछ अपनी जान के साथ लुटाने की क़सम खा ली।

वे मौलवी बन गए और पुरे हिंदुस्तान को जगाने के लिए निकल पड़े। लोगों का मानना था की उनके एक हाथ में तलवार तो दुसरे में कलम है।

वे क्रन्तिकारी पम्पलेट लिखते जिसमे वे अवाम से अंग्रेजो के खिलाफ जिहाद करने की अपील करते और उसे खुद गाँव गाँव जाकर बांटते। 1857 के जंग ए आजादी की एक बेशकीमती दस्तावेज के तौर पर एक ऐलान नामा “फ़तहुल इस्लाम” के नाम से मिली। इस पत्रिका को निकलने वाले का नाम तो नही मिला पर उस पत्रिका के मौजू (विषय) और विवरण से ये अंदाजा लगा की उसे मौलाना अहमदुल्लाह शाह जो फ़ैजाबाद के मौलवी के नाम से मशहूर थे उन्होंने ही लिखी थी।

इस पत्रिका में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने के लिए दर्खाश्त की गयी थी। पत्रिका में अवाम को जंग के तौर तरीके और और नेतृत्व के बारे में समझाने की कोशीश की गयी है जो दिलचस्प है। आगे उस पत्रिका में गैर मुस्लिमो को मुखातिब करते हुए लिखा गया है की वही हिन्दू अब भी है और अभी भी वही मुसलमान। वो अपने दिन पर कायम रहे और हम हमारे दिन पर, अगर हम उनकी हिफाजत करेंगे तो वो भी हमारी हिफाजत करेंगे। ईसाईयों ने हिन्दू और मुसलमानों को ईसाई बनाना चाहा पर अल्लाह ने हमे बचा लिया उलटे वो खुद ही खराब हो गये। इस पत्रिका के अंत में अंग्रेजों से किसी भी तरह का सम्बन्ध रखने से मना किया गया है और गुजारिश की गयी है की कोई भी हिंदुस्तानी अंग्रेजों के पास नौकरी ना करे।

मौलाना साहब खुद अपने लिखे हुए क्रांतिकारी पर्चे को गाँव गाँव जाकर पहुचाते। 1856 में मौलाना साहब जब लखनऊ पहुचे तो पुलिस ने उनके क्रांतिकारी गतिविधियों को रोक दिया। प्रतिबन्ध के बावजूद जब उन्होंने लोगों को आज़ादी की लड़ाई के लिए उकसाना बंद नही किया तो 1857 में उन्हें फ़ैजाबाद में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहापुर में लोगो को फिर से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जगाना शुरू कर दिया । जंग ए आज़ादी के दौरान मौलाना साहब को वोद्रोही स्वतंत्रता सेनानियो की उस 22वीं इन्फेंट्री का प्रमुख बनाया गया जिसने चिनहट की प्रसिद्ध लड़ाई में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना से एक बहुत ही जबरदस्त जंग लड़ा।

इस जंग में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा । जंग के बाद उन्हें जीते जी ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस नही पकड़ पाई और वो जीते जी अवाम के हर दिल अज़ीज़ बन गए।

लोगों का मानना था की मौलाना साहब में कोई जादुई शक्ति या ईश्वरीय शक्ति है जिसके कारण अंग्रेजों को उन्हें पकड़ना या मारना नामुमकिन था। हर मोर्चे पर फिरंगियों को भागना पड़ रहा था, तब 12 अप्रैल 1858 को गवर्नर जनरल कैनिंग ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए 50, 000 रुपये ईनाम का एलान किया जिस पर भारत के सचिव जी. एफ. ऐडमोंस्टन के दस्तखत थे। इसी इनाम के लालच में पुवायां के अंग्रेज परस्त राजा जगन्नाथ सिंह न उन्हें आमंत्रित कर 15 जून 1858 को धोके से उन्हें गोली मार कर शहीद कर दिया। चुंके मौलवी से पुवायां का राजा जगन्नाथ अपनी दोस्ती का दम भरता था। मौलवी राजा से मदद मांगने जब पुवाया पहुंचे. तो उन्हें दाल में कुछ काला लगा लेकिन इस बहादुर ने वापस लौटना अपनी शान के खिलाफ समझा। पैसों और रियासत की लालच में धोखे से मौलवी को शहीद कर दिया गया। उनके सिर को काटकर अंग्रेज़ जिला कलक्टर को राजा ने सौंपा और मुंहमांगी रकम वसूल की। इस विश्वासघात से देश के लोग रो पड़े। फिरंगियों ने अवाम में दहशत फैलाने की नीयत से मौलवी का सिर पूरे शहर में घुमाया और शाहजहांपुर की कोतवाली के नीम के पेड़ पर लटका दिया। यह अलग बात है कि कुछ जुनूनियों ने रात में सिर को उतारकर लोधीपुर गांव के नज़दीक खेतों के बीच दफना दिया जहां आज भी मौलवी का स्मारक मौजूद है।

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मौलाना साहब पर लिखते हुए ब्रिटिश अधिकारी थॉमस सीटन ने लिखा था – ‘ a man of great abilities of undaunted courage of stern determination and by far the best soldier among the rebels’

अंग्रेजों का आधिकारिक इतिहास लिखने वाले के. मालीसन ने लिखा कि :- ‘मौलवी एक असाधारण आदमी थे। विद्रोह के दौरान उसकी सैन्य क्षमता और रणकौशल का सबूत बार-बार मिलता है। उनके सिवाय कोई और यह दावा नहीं कर सकता कि उसने युद्धक्षेत्र में कैम्पबेल जैसे जंग में माहिर उस्ताद को दो-दो बार हराया और न जाने कितनी बार गफ़लत में डाला और उनके हमले को नाकाम किया। वह अपने देश के लिए जंग लड़ता है, तो कहना पड़ेगा कि मौलवी एक सच्चा राष्ट्रभक्त था। न तो उसने किसी की कपटपूर्ण हत्या करायी और न निर्दोषों और निहत्थों की हत्या कर अपनी तलवार को कलंकित किया बल्कि पूरी बहादुरी, आन, बान, शान से फिरंगियों से लड़ा, जिन्होंने उसका मुल्क छीन लिया था।’

फैज़ाबाद के स्वतंत्रता सेनानी रमानाथ मेहरोत्रा ने अपनी किताब ‘स्वतंत्रता संग्राम के सौ वर्ष’ में लिखा है कि ‘…फैज़ाबाद की धरती का सपूत मौलवी अहमद उल्लाह शाह शाहजहांपुर में शहीद हुआ और उसके खून से उस जनपद की धरती सींची गयी तो बीसवी सदी के तीसरे दशक में शाहजहांपुर की धरती से एक सपूत अशफाक उल्ला खां का पवित्र खून फैजाबाद की धरती पर गिरा। इतिहास का यह विचित्र संयोग है… एक फैज़ाबाद से जाकर शाहजहांपुर में शहीद हुआ तो दूसरा शाहजहांपुर में जन्मा और फैज़ाबाद में शहीद हुआ।’ शहीद–ए-वतन अशफाक ने अपनी जेल डायरी में एक शेर दर्ज किया है, ‘शहीदों की मजारों पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’ दिल पर हाथ रहकर आज अपने आप से खुद पूछें, इस अजूबे फकीर के वारिसों को शहादत पर याद करने की कितनी फुर्सत है? इस मुक्ति योद्धा की जिंदगी के ज्यादातर पन्ने अब भी रहस्य के गर्भ में हैं।

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पहली जंग-ए-आज़ादी के महानायक डंका शाह की भुला दी गयी शहादत

  1. शाह आलम इतिहास की कब्र को खोदकर आज़ादी के वीर सपूतों की रूहों को आज़ाद कराने के काम में बरसों से जुटे हैं। इस बार उन्होंने 1857 की पहली जंग-ए-आजा़दी के योद्धा सूफ़ी फ़कीर डंका शाह को खोज निकाला है जिनकी कब्र उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में है। डंका शाह अपनों के ही विश्वासघात के कारण 15 जून 1858 को शहीद हुए थे।

 

क्या आपको मालूम है, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी 1915 में बनी ‘आज़ाद’ सरकार मे Home Minister की हैसियत रखते थे..??

10 मार्च 1872 को स्यालकोट (पंजाब) मे एक सिख घराने मे एक लडके ने जन्म लिया , बाप लडके के पैदा होने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह चुका था ! जब लडके ने कुछ होश सम्भाला तो माँ ने उसे पढ़ने के लिए मामा के पास (सिंध) भेज दिया वहाँ उस लडके के ताललुकात कई फ़क़ीरों से और सूफ़ियों से हुआ , सूफ़ियों की तालीम उसे इस्लाम की तरफ़ खींचती और एक दिन वह अपना घर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ और सिंध के एक बुज़ुर्ग के हाथ पर इस्लाम को कबुल किया या दुसरे लफ़्ज़ मे कहे तो लडके ने अपने दिल की बात को ख़ुद से मनवा लिया । अपना नाम Ubiadullah रखा ।

25 बरस की उम्र तक मौलाना Ubaidullah सिंधी ने सूफ़ियों और ख़ानकाहो मे इल्म सीखते रहे उसके बाद देवबंद चले आए , यहाँ शेख़ उल हिन्द रह अल से मुलाक़ात हुइ , और छह साल तक देवबंद मे इल्म हासिल किया , फिकह , Logic और फ़लसफ़े मे महारत हासिल करने के बाद वापस सिंध लौट गये । प्रथम विश्व युद्ध के समय मौलाना , शैख़ उल हिन्द रह अल के कहने पर काबुल आ गये और देवबंद की सियासी तहरीक रेशमी रुमाल मे शामिल हो गये और फिर अफ़ग़ान के सरदार हबीबुल्ला खान की मदद से राजा महेन्द्र प्रताप की प्रवासी सरकार की स्थापना की गइ ।

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मौलाना Ubaidullah उस सरकार मे Home Minister की हैसियत से थे ! मौलाना लगभग सात साल काबुल मे रहे , प्रथम विश्व युद्ध के बाद हालात ख़राब हो चुके थे , जर्मनी बिखर चुका था तो रुस अपने घर मे ही क्रान्ति के दौर से गुज़र रहा था ।

मौलाना रुस को रवाना हो गये अपनी आँखो के सामने रुस के क्रान्ति को देखने , लेनिन से कभी मिल तो नही पाए लेकिन रुस की क्रान्ति ने मौलाना की ज़िन्दगी मे नया इनक़लाब ला चुका था 1923 मे मौलाना वहाँ से तुर्की चले गये वहाँ भी कमाल पाशा के हाथ तुर्की नई ज़िन्दगी की शुरुआत कर रहा था , मौलाना पर वामपंथी विचारधारा का कितना असर हुआ था ये कहना आसान नही लेकिन मौलाना वामपंथी विचारधारा को Unnatural मानते थे । तुर्की से मौलाना मक्का की तरफ़ निकल गये , वहाँ आल सउद की हुकूमत बन चुकी थी , लगभग दस साल तक मौलाना वहाँ रहे , पढ़ने पढ़ाने का काम जारी रखा ! दिल मे एक कसक थी वतन लौटने की , लौटना आसान नही था आख़िर 1936 मे कांग्रेस की मदद से अंग्रेज़ की प्रमिशन वतन लौटने की मिली , और मौलान 1938 मे कराची लौट आए ।

मौलाना कांग्रेस के कभी मेमबर नही रहे उसके बाद भी मौलान कांग्रेस के आसपास ही रहे , वक़्त को हालात को देखते हुए मौलाना अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ गांधी जी के हथियार अहिंसा को सही मानते थे ! 1944 मे मौलाना अपने बेटी से मिलने वापस पंजाब जाते है वही बिमार हो जाते है और 22 अगस्त 1944 को इस दुनिया को अलविदा कह जाते है ।

कुछ बातें मौलाना Ubaidullah सिंधी रह अल के ज़बान से ,,,,,,,,,,,,

एक दिन मौलाना बड़े गमगीन से थे ,और कहने लगे मैं मुसलमानों को ज़रूरत की बातें कहता हुँ ! लेकिन वो सुनते नही बल्कि उलटा मुझे बुरा भला कहते हैं ! मैं सोलह बरस का था जब मैं घर छोड़ कर निकल आया था ! मेरा ख़ानदान बहुत बड़ा न था और न ही हमारे यहाँ दौलत की भरमार थी लेकिन मेरी माँ थी मेरी बहन थी और उनकी मोहब्बत मेरे दिल मे थी लेकिन इस्लाम से मुझे इतनी मोहब्बत थी मैंने किसी को ख़ातिर न लाया ! खुदा जानता है माँ को छोड़ने से मुझे किस क़दर ज़हनी तकलीफ़ हुइ थी ।

हज़रत शेख़ उल हिन्द रह अल ने मुझे इस्लाम सिखाया और उनके ज़रिए मैंने शाह वलीउलाह की तालीमात हासिल की , क़ुरान समझा और दीन इस्लाम की हक़ीक़त को समझा ! अब अगर मैं मौजूद मज़हबी तबक़ों के ख़िलाफ़ कोइ बात कहता हुँ , तो उसे ये समझना के मैं मज़हब के ख़िलाफ़ हुँ किस क़दर ग़लत है ! मैंने दुनिया की अज़ीज़ अपनी माँ की मोहब्बत को छोड़ कर मज़हब की मोहब्बत को अपनाया , उम्र भर तकलीफ़ और मुसीबत झेलने के बाद भी मुझे मुसलमान होने पर फ़ख़्र है ।

( मौलाना Ubaidullah सिंधी की हालत जिनदगी , उनकी तालीमात और उनकी सियासी फ़िकर पर प्रोफ़ेसर मोहम्मद सरवर साहब ने एक किताब लिखी है , किताब पढ़ने के बाद इस नतीजे पर हु उनकी जिनदगी को किसी एक पोस्ट मे समाया नही जा सकता , Political Science के स्टूडेंट्स के लिए उनकी जिनदगी मे बहुत कुछ है , जो लोग इस देश मे गंगा जमनी तहज़ीब को बचाना चाहते हैं उनके लिए भी मौलाना की ज़िंदगी मे बहुत कुछ है और जो लोग सुफिसम को समझना चाहते है ,मज़हब को समझना चाहते है उनके सीखने और समझने के लिए मौलाना की जिनदगी मे बहुत कुछ है ।)

Kamran Ibrahimi

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Maulana Ubaidullah Sindhi

Born in a Uppal Khatri family of Sialkot on March 10, 1872, he was a political activist of the Indian independence movement and one of its leaders. His father Ram Singh Zargar died four months before Ubaidullah was born. Ubaidullah converted to Islam early in his life after reading books on Islam and later enrolled in the Darul Uloom Deoband, where he was at various times associated with other noted Islamic scholars of the time, including Maulana Rasheed Gangohi and Mahmud al Hasan. Maulana Sindhi returned to the Darul-Uloom Deoband in 1909, and gradually involved himself in the Pan-Islamic movement. During World War I, he was amongst the leaders of the Deoband School, who, led by Maulana Mahmud al Hasan, left India to seek support of the Central Powers for a Pan-Islamic revolution in India in what came to be known as the Silk Letter Movement. A movement organised by the Deobandi leaders between 1913 to 1920, aimed at freeing India from the British rule by allying with Ottoman Turkey, Imperial Germany, and Afghanistan.

Maulana Sindhi reached Kabul during the war to rally the Afghan Amir Habibullah Khan, and after brief period, he offered his support to Raja Mahendra Pratap’s plans for revolution in India with German support. He joined the Provisional Government of India formed in Kabul in December 1915, and remained in Afghanistan until the end of the war, and left for Russia. He subsequently spent two years in Turkey and, passing through many countries, eventually reached Hijaz (Saudi Arabia) where he spent about 14 years learning and pondering over the philosophy of Islam especially in the light of Shah Waliullah’s works. In his early career he was a Pan-Islamic thinker. However, after his studies of Shah Waliullah’s works, Ubaidullah Sindhi emerged as non-Pan-Islamic scholar. He was one of the most active and prominent members of the faction of Indian Freedom Movement led by Muslim clergy chiefly from the Deoband.

He was very active in covert anti-British propaganda activities during this time. This led to his alienization by Deoband leaders. In 1912 he moved to Delhi and started another institution by the name of Nazaaratul Ma’aarif. . In 1915 he left for Kabul from where he started the “Silk handkerchief” movement. This was a landmark movement in the process of Indian independence. He travelled to Moscow and later Turkey and eventually came home after living in Mecca for 13 years.

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In 1936, the Indian National Congress requested his return to India and the British Raj subsequently gave its permission. He remained at Delhi, where he began a programme teaching Shah Waliullah’s Hujjatullahil Baalighah to Akbarabadi, who would then write an exegesis in his own words. Ubaidullah left for Rahim Yar Khan to visit his daughter in 1944. At Deen Pur (Khanpur), he was taken seriously ill and died on 22 of August 1944 at Deen Pur.
(wikipedia.org)

मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी

The German Mission to Afghanistan 1915-16

 

पहला स्वदेशी फार्मास्युटिकल ब्रांड सिप्ला ब्रांड के संस्थापक ख़्वाजा अब्दुल हमीद एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे.

31 अक्टूबर, 1898 को जन्मे सिप्ला ब्रांड के संस्थापक स्व. डॉ. ख़्वाजा अब्दुल हमीद देश के उन गिन-चुने शिक्षित मुस्लिमों में एक थे, जिन्हें विभाजन के बाद मोहम्मद अली जिन्ना अपने साथ पाकिस्तान ले जाना चाहते थे, पर वे देशभक्त मुस्लिम युवा पाकिस्तान नही गए ।

ख़्वाजा अबदुल हमीद की पैदाईश 31 अकतुबर 1898 को उनके रिशते मे नाना लगने वाले ख़्वाजा मोहम्मद युसुफ़ के अलीगढ़ स्थित घर मे हुई, ख़्वाजा अबदुल हमीद के वालिद का नाम ख़्वाजा अब्दुल अली और वलिदा का नाम मसुद जहाँ बेगम था। ख़्वाजा अबदुल अली मोहमडंन एंगलो ओरिँटल कालेज सबसे पहले पढ़ कर निकलने वाले लोगो मे थे.

शुरुआती वकालत क बाद जब ख़्वाजा अबदुल हमीद के पिता ख़्वाजा अबदुल अली ने जब अंग्रेज़ी हुकुमत के यहाँ एक अच्छे ओहदे पर नौकरी करने लगे तो ख़्वाजा अबदुल हमीद ने उनका मुख़ालफ़त किया के उन्हे अंग्रेज़ोँ के फ़ितने मे नही आना चाहीए,

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ख़्वाजा अबदुल हमीद ने 1908 मे शुरुवाती पढाई मेंटो सर्किल से की फिर इस्लामिया हाई स्कुल इटावह मे दाख़ला लिया फिर यहां से पास करने के बाद आगरा कालेज मे दाख़िला लिया जहां उन्होने साईंस की पढाई की शुरुवात की, इसी बीच ख़्वाजा अबदुल हमीद के वालिद ने उन्हे मद्रास के लेदर ट्रेनिंग स्कुल भेज दिया जहां उन्होने एक साल रह कर पढ़ाई की और काफ़ी टेकनिकल इल्म हासिल की फिर अल्लाहाबाद घुमने गए जहां हमीद के भाई मुईर सेँट्रल कालेज मे ज़ेर ए तालीम थे. हमीद ने मद्रास को छोड़ 1918 मे मुईर सेँट्रल कालेज मे ही BSc मे दाख़िला ले लिया फिर यहीं से 1920 मे MSc करने को सोची इसी बीच जब महात्मा गांधी और अली बेरादरान के कियादत मे ख़िलाफ़त तहरीक और असहयोग आंदोलन के समय सरकारी इदारो के बाईकाट का एलान किया गया तो ख़्वाजा अबदुल हमीद ने भी अपने इदारे मुईर सेँट्रल कालेज अल्लाहाबाद मे हड़ताल कर दिया जिस वजह कर उन्हे युनिवर्सीटी से निकाल बाहर कर दिया गया, और फिर ग्रेडुएशन सेरिमनी मे ख़लल डालने के जुर्म मे गिरफ़्तार भी कर लिया गया, फिर यहां से ख़्वाजा अबदुल हमीद वापस अलीगढ़ आ गए , इसी बीच क्रांतीकारी मुसलिम राष्ट्रवादियोँ ने अलीगढ़ मे एक इदारह खोला जो के एक ग़ैरराजनैतिक और शुद्ध शैक्षिक संस्था थी जहां के काएद ने एक ओर सच्चे मुसलमान पैदा करने की कोशिश की, वहीं दुसरी ओर देश सेवा की भावना भी जागृत की, इसी मे ख़्वाजा अब्दुल हमीद केमेस्ट्री पढ़ाने लगे, इस इदारे को दुनिया आज “जामिया मीलिया इस्लामीया” के नाम से जानती है. यही उन्होने अपने देख रेख मे खादी के कपड़े बनवाए और बेचवाए. यहीं अलीगढ़ मे ही अपने चाचा के घर पर सबसे पहले महात्मा गांधी , मोती लाल नेहरु और जवाहर लाल नेहरु से मिले. “जामिया मीलिया इस्लामीया” मे पढ़ाते वक़्त ही डा ज़ाकिर हुसैन जो के बाद मे भारत के राष्ट्रपती भी हुए से ख़्वाजा अब्दुल हमीद की दोस्ती काफ़ी गहरी हो गई थी फिर सन् 1923-24 तक यहां पढाने के बाद दोनो ही आगे की पढ़ाई पुरी करने के लिए र्जमनी के लिए निकल पड़े. अपने बेटे को आगे पढ़ाने के लिए ख़्वाजा अब्दुल हमीद की मां ने अपने दो मकान बेट डाले थे.

वहां ख़्वाजा अब्दुल हमीद ने बेरियम कम्पाउंड्स पर रिसर्च करके डॉक्टरेट (पीएचडी) प्राप्त की। तीन वर्ष के बर्लिन प्रवास में उनकी एक क्रांतिकारी यहूदी युवती से मुलाकात हुआ। दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया। जर्मनी पर नाजियों की गिरफ्त बढ़ रही थी। इस प्रेमी युगल को इस उथल पुथल के दौरान जर्मन से रातोंरात पलायन करना पड़ा। यूरोप या इंग्लैंड में डॉ. ख्वाजा अब्दुल हमीद को उच्च शिक्षा के कारण अच्छी नौकरी मिल सकती थी, पर वे पत्नी के साथ सन् 1928 में स्वदेश लौट आए।

1928 मे ही ख़्वाजा अब्दुल हमीद अपने साथीयों के साथ बर्लिन र्जमनी मे जंगे आज़ादी और ख़िलाफ़त तहरीक के क़द्दावर नेता मौलाना मोहम्मद अली जौहर से मिले थे.

यूरोप मे रहने के दौरान ख्वाजा अब्दुल हमीद ने तकनीक व शोध अनुसंधान आधारित उद्योग देखे थे। गुलाम भारत में भी ऐसे उद्योग हों, इस संकल्प के साथ डॉ. ख्वाजा अब्दुल हमीद ने सन् 1935 में अहमदाबाद में 6 लाख रुपए की सीड केपिटल से द केमिकल इंडस्ट्रियल एंड फार्मास्युटिकल लेबोरेटरीज (संक्षेप में सिप्ला) की स्थापना की।

सन् 1937 में सिप्ला का पहला उत्पाद मार्केट में पहुंचा तो मीडिया ने लिखा- भारतीय उद्योगपति भी शोध अनुसंधान व तकनीक पर दांव लगाने लगे हैं। सन् 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सिप्ला ने लोगों को जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध करवाने के साथ फाइन केमिकल्स भी बनाना शुरू किए। सन् 1944 में सिप्ला ने बॉम्बे सेंट्रल में फार्मा मेन्यूफेक्चरिंग सुविधा जुटाई और हायपर टेंशन के उपचार के लिए सेफिनाइड लांच की। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में लोगों को तनाव तोडऩे लगा था। अमेरिका ने सिप्ला से यह ड्रग्स बड़ी मात्रा में खरीदी।

सिप्ला ने एक स्विस फर्म के लिए फोरोमाइसिन भी बनाई। सन् 1968 में सिप्ला ने देश में पहली बार एम्पीसिलिन लांच की। सन् 1972 में टेक्नोप्रिनर डॉ. ख्वाजा अब्दुल हमीद का निधन हुआ, पर इसके पहले उन्होंने अपने देश को एक और सौगात दी। सिप्ला ने वैज्ञानिक खेती के लिए मेडिको प्लांट्स विकसित करने के लिए बैंगलूरू में एग्रीकल्चर रिसर्च डिवीजन स्थापित किया। 1972 में गंभीर बीमारी की वजह केर उनका इन्तक़ाल हो गया था…

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